महर्षि दयानंद का राष्ट्रवाद

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• महर्षि दयानंद का राष्ट्रवाद •

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डॉ. लाल साहब सिंह

पुनर्जागरण-काल के समाजसेवी लोकैषणा और आत्मचिन्तन तक ही सीमित थे, वहां दयानंद ने मातृभूमि की दुर्दशा से द्रवित होकर उसके कल्याण और मुक्ति हेतु सार्थक चिंतन प्रस्तुत किया है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को जागृत करने के लिए अपने ब्रह्मसुख का परित्याग कर दिया। उनके लिए राष्ट्र-मुक्ति ही परम धर्म था। एक संन्यासी द्वारा इस प्रकार का चिन्तन अभूतपूर्व था। उनके राष्ट्रवादी चिन्तन की सर्वप्रमुख विशेषता भारतीयता थी। इसी से प्रभावित होकर मुंशी प्रेमचन्द्र ने कहा था कि, “दयानन्द भारतीयता का अवमूल्यन नहीं करना चाहते थे। भारत के शव पर प्रगतिवाद एवं पश्चिम के डिजाईन का भवन वे सहन नहीं कर सकते थे।” दयानन्द के लिये आर्य जाति चुनी हुई जाति, भारत चुना हुआ देश और वेद चुनी हुई धार्मिक पुस्तक थी।

इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि दयानन्द विशुद्ध भारतीय राष्ट्रवाद के जनक थे।दयानन्द का राष्ट्रवाद मात्र सैद्धान्तिक ही नहीं, अपितु व्यावहारिक भी है। उसमें भारत के समग्र क्रान्ति का संदेश निहित है। वह विशुद्धतः आध्यात्मिक राष्ट्रवाद है। उसका सम्बन्ध बुद्धिवाद से है, भाग्यवाद से नहीं।

दयानन्द के राष्ट्रवाद का भारतीय राष्ट्रवादी अवधारणा पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा

-1. इसने भारतीयों में स्वदेशप्रेम को सजीव किया।

2. राष्ट्र के लोगों में गोरव और आत्मसम्मान का भाव उत्पन्न किया।

3. एकता की भावना को सुदृढ़ किया।

4. भारतीयों में सद्गुणों को विकसित करने को प्रेरणा दी।

5. आपसी सहयोग, सद्भाव एवं सहानुभूति उत्पन्न की।

6. राष्ट्रीय धर्म एवं संस्कृति का विकास किया।

7. धार्मिक मिथ्याडम्बरों एवं सामाजिक दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त किया।

8. स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की प्रेरणा दी।

9. एक राष्ट्र भाषा को अपनाने की भावना पैदा की।

10. पाश्चात्य वैज्ञानिक आविष्कारों से उत्पन्न व्यामोह को समाप्त किया।

11. वेद के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जागृत किया।

12. साम्प्रदायिक मतभेदों को भुला कर वेदोक्त धर्म के अनुकरण का संदेश दिया।

13. स्वराज्य प्राप्ति-हेतु लोगों में बलिदान की भावना उत्पन्न किया।

14. नया जीवन-दर्शन दिया।

15. भारतीयों को उनके सच्चे स्वरूप से अवगत कराया।

16. एकाकी एवं आत्महीन जीवन को मिटाकर आशा का संचार किया।

17. स्वतन्त्रता के सिद्धान्त को जन्म दिया।

18. प्रजातान्त्रिक भावना को प्रोत्साहित किया।

19. आध्यात्मिक शांति एवं राष्ट्र-प्रेम का मार्ग प्रशस्त किया।

20. उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद के उन्मूलन को बल प्रदान किया।

21. विश्व-शांति एवं विश्व-मैत्री का पाठ पढ़ाया।

22. देशी राजाओं को संगठित होने की स्फूर्तिदायक प्रेरणा दी।

23. राष्ट्र-सेवा को मानव-सेवा का उच्च पद प्रदान किया।

24. स्वतन्त्रता संग्राम की भावना को गति प्रदान की।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि दयानन्द के राष्ट्रवाद ने वर्तमान स्वतन्त्र भारत की पृष्ठभूमि तैयार की।

[स्रोत : आर्य संसार का 1989 का वार्षिक विशेषांक “स्वामी दयानंद का राजनीतिक दर्शन”, संपादक : प्रो. उमाकांत उपाध्याय, प्रकाशक : आर्य समाज कोलकाता, पृ. 338-340,

प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]

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