महर्षि दयानन्द दया का था सागर

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महर्षि दयानन्द दया का था सागर

महर्षि दयानन्द दया का था सागर,
जगत के व्यथा की दवा बनके आया।
तिमिर छा रहा था अविद्या का भू पर,
गगन में दिवाकर नया बनके आया ।।

किसी का खुदा आसमां में पड़ा था,
किसी का प्रभु क्षीर सागर में सोया।
धरा पर बहुत ईश्वर लग रहे थे,
सभी में है व्यापक ऋषि ने बताया ।।

यह मानव भटकता चला जा रहा था,
नहीं जानता था किधर जा रहा हूं।
दयालु दयानन्द भटकते जगत का,
सहारा हुआ देवता बनके आया ।।

हमारी सरस संस्कृति मिट रही थी,
सरल देव भाषा विदा हो चुकी थी।
ऋणी हम तुम्हारे महर्षि हमारे,
पुनः भारतीयों को तूने जिलाया।।

ऋषिराज मेरी यही अर्चना है,
तुम्हारे चरण में यही वंदना है।
माने न माने कोई पर दयानन्द,
सकल विश्व का तू सखा बनके आया।।