एक प्यारा सा गांव, जिसमें पीपल की
एक प्यारा सा गांव,
जिसमें पीपल की
छांव हम उसे छोडकर,
उससे मुख मोडकर
अन्जान से हो गये है,
भीड में खो गये।
वो निश्छल सा मन,
जिसमें था अपनापन,
हर डगर प्यार की
अच्छा था बोला पन,
अब नूरानी बने,
बडे ज्ञानी बने,
दिल पाषाण से हो गये है,
भीड कें…..
दादा दादी की गोदी
था मेरा सदन,
फाल्गुन सा बुढापा
करता था बालपन,
अब वो कहानी कहां,
नाना नानी कहां,
बासी पकवान से हो गये है
भीड में……
ऋचाओं की छाया
में शम झरता था,
सारे तापो का सुरेन्द्र
शमन करता था,
दिन मधुमास के,
बनके उपवास से,
फीकी मुस्कान से हो गये है।
भीड में……
नोट :- प्रथम पंक्ति दूरदर्शन पर गाये किसी कवि की है।










