कण-कण में जो रमा है

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कण-कण में जो रमा है

कण-कण में जो रमा है,
हर दिल में है समाया।
उसकी उपासना ही,
कर्तव्य है बताया।। टेक ।।
कण-कण में……

दिल सोचता है खुद को,
कितना महान होगा,
इतना महान जिसने,
संसार है रचाया।।१।।
कण-कण में….

देखो ये तन के पुर्जे,
करते हैं काम कैसे।
जोड़ों के बीच कोई,
कब्जा नहीं लगाया।।२।।
कण-कण में….

इक पल की रोशनी से,
सारा जहान चमका।
सूरज का एक दीपक,
आकाश में जलाया।।३।।
कण-कण में….

अब तक ये गोल धरती,
चक्कर लगा रही है।
फिरकी बना के कैसे,
तरकीब से घुमाया।।४।।
कण-कण में….

कठपुतलियों का हमने,
देखा अजब तमाशा।
छुपकर किसी ने सब को,
संकेत से नचाया।।५।।
कण-कण में….

हर वक्त बनके साथी,
रहता है साथ सबके ।
नादान ‘पथिक’ उसको,
तू जानने न पाया।।६।।
कण-कण में…..