धन्य महर्षि एजी कोई दयानन्द आपको जी।

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धन्य महर्षि एजी कोई दयानन्द आपको जी।

धन्य महर्षि एजी कोई
दयानन्द आपको जी।
दीनी है अविद्या मिटाय ।।

ज्ञान की गंगा चहुँ दिशि
बहि रही जी। ओम् का
झंड़ा लेकर हाथ में जी।।

एजी कोई हलचल दीनी मचाय।
चर्चा महर्षि की जग
में हो रही जी।।

पोप पुजारी पण्डे सब
डर गये जी। एजी कोई
स्याने भगे घबराय ।। ज्ञान की०

ढोंगियों की ठगाई
कम हो गई जी।
पत्थर-पूजा अब
कम हो गयी जी।।
एजी कोई सन्ध्या हवन रचाय ।।

ज्ञान की० नारी को कहते थे
जूती पैर की जी। ज्ञानंकी
गंगा चहुँदिशि बहि रही जी।। ज्ञानकी०