दारा सुतन भुवन में फंसकर

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दारा सुतन भुवन में फंसकर

दारा सुतन भुवन में फंसकर
भार सभी का ढोना क्या है।

जो नरतन देवन को दुर्लभ,
सो पाया तब रोना क्या है।

मन मन्दिर नहीं कींना निर्मल,
बाहर का तन धोना क्या रे।

ओ३म् नाम का सुमिरन करले,
अन्त समय में होना क्या रे।

जब वैराग्य ज्ञान घट छायो,
तब चांदी और सोना क्या रे।

‘गिरीधरदास’ उदर पूरे को,
मीठा और सलोना क्या रे।