ये विदुषी गावें गारी जी

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ये विदुषी गावें गारी जी

ये विदुषी गावें गारी जी
तुम सुनो सकल व्यभिचारी,
ले मिष्ठान जाँय वेश्या-गृह
अर्पण करें अगारी।
घोंटू दिये पेट में बैठी
भूखी मरै घरवारी जी ।। ये०।।१

रण्डी के घर जाकर करते
उसकी ताबेदारी,
निज त्रिया जो सेवा करती
देते उसे बिसारी जी।। ये०।।२

जहाँ कहीं हो नृत्य वेश्या
का पहुँचे वहाँ अगारी,
सीख न देते पुत्र अपने को
बैठा लेते अगारी जी।। ये० ।।३

पुत्र हाथ रुपया दिलवावें
दान समझ के भारी,
या तो बहन लगै है उनकी
या लागै महतारी जी।। ये० ।।४

ब्रह्मचर्य की बान छुटाई है
सन्तान दुखारी,
वह बुद्धि विद्या सब खोके बन गये
सभी भिखारी जी ।। ये०।।५

कहें ‘आर्य’ प्यारी बहनो
तुम सुनलो बात हमारी,
धन्य भाग्य भारत के आ गये
दयानन्द ब्रह्मचारी जी।। ये० ।।६