वो तो अन्दर से समझा रहा है हमें

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वो तो अन्दर से समझा रहा है हमें

वो तो अन्दर से समझा रहा है हमें,
हम समझना न चाहें, तो वो क्या करे
वो तो कहता है, आदत बुरी छोड़ दो,
हम बदलना ना चाहें, तो वो क्या करे
वो तो अन्दर से समझा रहा है हमें,
हम समझना न चाहें, तो वो क्या करे

कितनी जल्दी अन्धेरों में हम घिर गये
आया झोंका हवा का तो हम गिर गये
वो बचाता है गिरने से हमको सदा
हम सम्भलना न चाहें तो वो क्या करे
वो तो अन्दर से समझा रहा है हमें,
हम समझना न चाहें, तो वो क्या करे

जिस्म और जान को खो रहे हैं यूँ ही
उसने सब कुछ दिया रो रहे हैं यूँ ही
रोतों को वो हंसाने पे बेताब है
हम बहलना न चाहें तो वो क्या करे
वो तो अन्दर से समझा रहा है हमें,
हम समझना न चाहें, तो वो क्या करे

कौन कहता है गिरते कभी हम नहीं
गिर पड़े गहरे खड्ड में तो कुछ गम नहीं
वो तो खड्ड में भी सीढ़ी लगा देता है
वो तो खाई में सीढ़ी लगा देता है
हम निकलना न चाहे तो वो क्या करे
वो तो अन्दर से समझा रहा है हमें,
हम समझना न चाहें, तो वो क्या करे

पैर ना थे तो हसरत थी हम भी चले
सैर भीगी हुई घास पर हम करें
उसने बेजान पैरों में हरकत भरी
हम टहलना न चाहें तो वो क्या करे

चमकने वाले जब बा-खता हो गए
कई सितारे “विजय” लापता हो गए
वो तो डूबे सितारों को रोशन करे
हम उभरना न चाहें तो वो क्या करे

वो तो अन्दर से समझा रहा है हमें,
हम समझना न चाहें, तो वो क्या करे
वो तो कहता है, आदत बुरी छोड़ दो,
हम बदलना ना चाहें, तो वो क्या करे
हम सम्भलना न चाहें तो वो क्या करे
हम निकलना न चाहे तो वो क्या करे