विमल इन्दु की विशाल किरणें
विमल इन्दु की विशाल किरणें
प्रकाश तेरा बता रही हैं
अनादि तेरी अनन्त माया
जगत् को लीला दिखा रही हैं
प्रसार तेरी दया का कितना
ये देखना हो तो देखे सागर
तेरी प्रशंसा का राग प्यारे
तरङ्ग-मालाएँ गा रही हैं
विमल इन्दु की विशाल किरणें
प्रकाश तेरा बता रही हैं
तुम्हारा स्मित हो जिसे निरखना
वो देख सकता है चन्द्रिका को
तुम्हारे हँसने की धुन में नदियाँ
निनाद करती ही जा रही हैं
विमल इन्दु की विशाल किरणें
प्रकाश तेरा बता रही हैं
जो तेरी होवे दया, दयानिधि !!!
तो पूर्ण होता ही है मनोरथ
सभी ये कहते पुकार करके
यही तो आशा दिला रही है
विमल इन्दु की विशाल किरणें
प्रकाश तेरा बता रही हैं
अनादि तेरी अनन्त माया
जगत् को लीला दिखा रही हैं
विमल इन्दु की विशाल किरणें
प्रकाश तेरा बता रही हैं
रचनाकार :- महाकवि जयशंकर प्रसाद जी
उपर्युक्त भजन के साथ मूल-भजन/गीत के
निम्न अन्तरा-शब्दों को भी गाया जा सकता है :-
विशाल मन्दिर की यामिनी में
जिसे देखना हो दीपमाला
तो तारका-गण की ज्योति उसका
पता अनूठा बता रही हैं
प्रभो ! प्रेममय प्रकाश तुम हो
प्रकृति-पद्मिनी के अंशुमाली
असीम उपवन के तुम हो माली
धरा बराबर जता रही है
विमल = स्वच्छ
इन्दु = चन्द्रमा
प्रसार = फैलाव
सागर = समुद्र
अनन्त = जिसका कोई अन्त न हो
प्रशंसा = बड़ाई
जगत् = संसार
दया = करुणा
तरङ्ग मालाएं = लहरों के समूह
स्मित = मुस्कान, मन्दास,
चन्द्रिका = चन्द्रमा का प्रकाश, चाँदनी,
निनाद = आवाज, ध्वनि
दयानिधि = दया का भंडार, ईश्वर
मनोरथ = अभिलाषा, मन की इच्छा
आशा = विश्वास










