वायु के घोड़े पर सवार

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पवस्व देव आयुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः वायुमारोह धर्मणा
सा.४८३, क्र. १२३५

तर्ज : चा जाड़ी आड़ी यू रंग दी

आत्मा हमारी तू रंग दे, हरपल समय में तू संग दे

मस्ती में ये मन झूम उठे, थिरकन उठे अङ्ग अङ्ग से ॥ आत्मा हमारी…

ईश कृपा का ये अमृत है जिसमें सांसारिक रस की तो उपमा नहीं
ईश की महिमा का दर्शन ही सचमुच अनुभूतियाँ हैं अलौकिक सही
बह निकला एक बार ये रस रुकता नहीं
करता हूँ कोई काम स्रोत बहता वहीं
जीवन रंगा प्रभु तूने ऋजु रंग में ॥ आत्मा हमारी…

खाना पीना खेलना कूदना भी हो गया है सब उपासना रूप
हर काम में मस्ती सर पे सवार है जाप हृदय में है छाया अटूट
विन बाधा चिन्तन प्रभु का होता अपने आप
खाते पीते उठते बैठते मन करता प्रभु-जाप
छा गया है नशा प्राण अङ्ग अङ्ग में ॥ आत्मा हमारी…

ये तेरा धर्म है अब तू हवा के घोड़े पे चढ़के प्रभु प्रेम धर
ये जो नशा तेरी आत्मेन्द्रियों में है धर्मयात्रा को अपरिमित तू कर
निज आत्मालाद को सब हृदयों में भर,
अपनी मस्ती से अब सबको मस्ताना कर
नभ धरणी पे गीतों का रंग भर दे ॥ आत्मा हमारी…