तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना, जिसे मैं उठाने के काबिल नहीं हूँ।

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कृतज्ञता

तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना,
जिसे मैं उठाने के काबिल नहीं हूँ।
मैं तो आ गया हूँ मगर जानता है,
तुझे मुँह दिखाने के काबिल नहीं हूँ। ।।।।

जमाने की चाहत में खुद को मिटाया,
तेरा नाम हरगिज जुबां पर न लाया।
गुनाहगार हूँ मैं खतावार हूँ मैं,
तुझे मुँह दिखाने के काबिल नहीं हूँ।।2।।

तुम्हीं ने अदा की यह जिन्दगानी,
मगर तेरी महिमा मैंने न जानी।
करजदार हूँ तेरी दया का मैं इतना,
कि कर्जा चुकाने के काबिल नहीं हूँ।
तुझे मुँह दिखाने के काबिल नहीं हूँ।।3।।

माना कि दाता हो तुम कुल जहाँ के,
मगर कैसे झोली फैलाऊँ मैं आगे।
जो पहले दिया है वही कम नहीं है,
उसी को चुकाने के काबिल नहीं हूँ।

तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना,
जिसे मैं उठाने के काबिल नहीं हूँ।
मैं तो आ गया हूँ मगर जानता हूँ,
तुझे मुँह दिखाने के काबिल नहीं हूँ।।4।।