अया पवस्व धारया यया सूर्यमरोचयः ।
हिन्वानो मानुषीरप: ॥
साम. ४७३, १२१६ ऋ. ७.६२.७
तर्जः सखी री नहीं आए
आती है नित नई सुनहरी भोर,
डाल पे कोयल कुहु कुहु गाए
और पपीहरा शोर मचाए, घर आँगन उजियारा छाए
नाच उठे मन की लहरी, बनी भोर बड़ी चित्तचोर
आती है…
ऋषियों ने भी पूर्व सृष्टि में, सूर्य का, किया था शुभदर्शन
बजी हृदय की तार तरंगे, सुनी किरणों की सरगम
भरा रहा संजीवन रस का, हृदय का हर इक कोर
आती है…
कहाँ गया संजीवन रस, लगता था जो सुहाना
हसू देखी शान्त प्रकृति, क्यूँ है अशान्त जमाना?
यों मानव के मन में जागे, ईर्ष्या द्वेष और क्रोध ?
आती है…
ऐ सूरज की किरणों, तुमसे, क्यों वञ्चित तेरे अपने ?
जा में आके भूल गए, सब उजियारी रस्में
अया ना तो चारु चुम्बन, हृदय कली की ओर
आती है…
उति हुआ है आज तो फिरसे, सुरज नया सुहाना
किणें छाई छिड़ गया मानो, सुर संगीत-तराना
हमाली बिछ गई धरा पे, गई लहर सी दौड़ ॥ आती है…
मा सोम का जन्म हुआ है, खुला रसों का खजाना
वण पावन धर्म मेघ रस, जग हुआ प्रेम-दीवाना
प्रज मानवीय भक्ति-रस में हो गई आत्म विभोर ॥ आती है…
रस्में रीति ज, चारु मनोहर, सुन्दर










