सोने में हो कुंभकरण सा, भोजन अधिक पचाता है।

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सोने में हो कुंभकरण सा, भोजन अधिक पचाता है।


सोने में हो कुंभकरण सा,
भोजन अधिक पचाता है।
सुनने में हो बहरा जैसा,
सिंह सम दौड़ लगाता है।
डरने में हो गीदड जैसा,
चीज ना कोई लखाता है।
रोना जाने चले जो पंगु,
सेवक श्रेष्ठ कहाता है।

“धर्मी”जब-जब जहां कहीं पर,
पाप अधिक बढ़ जाता है।
स्त्री इतनी दूषित होती,
पतिव्रत धर्म ना भाता है,
जिस स्कूल में हो दूषित नारी,
नीच गति वह पाता है।
ऐसे कुल में हर एक जन ही,
नीचा मनुष्य कहाता है।


जिस के पास में धन होता है,
जग में बड़ा कहाता है।
उससे बड़ा बतावें उसको,
बंधु बहुत से पता है।
उससे बड़ा हो आयु वाला,
कर्मीं आगे जाता है।
“धर्मीं”विद्या वाले के गुण,
गीत जगत सब गाता है।

जिस राजा के राज्य में “धर्मी”
मिलें चोर और जार नहीं।
सभी प्रेम की वाणी बोलें,
कड़वा बोलन हार नहीं।
सब आज्ञा का पालन करते,
करें कोई तकरार नहीं।
स्वर्ग समान वही राजधानी,
और स्वर्ग का द्वार नहीं।

“धर्मवीर” उस परम् पिता ने,
उज्जवल जगत रचाया है।
प्रलय काल में श्री मनु ने,
अंधकार बतलाया है।
कैसा था और क्या कुछ था,
यह नहीं समझ में आया है।
ऋषि मुनि और साधु संत,
सब ही ने पता पता लगाया है।