सोई कौम को जगाया
सोई कौम को जगाया,
स्वामी दयानन्द ने,
चमत्कार था दिखाया,
स्वामी दयानन्द ने।
खुद तो ईंटें पत्थर खाए
खंजर बरछी भाले,
सोलह सत्रह बार ऋषि ने,
पिए जहर के प्याले ।।
सबको अमृत ही पिलाया ।। स्वामी…
उजड़ गया था बाग हमारा,
सूखी डाली-डाली
टंकारा का वह संन्यासी,
आ गया बन के माली।
फिर से बाग को महकाया।। स्वामी..
आसमान को देख-देख
कर दुःखी आत्मा तरसी,
प्यासे मन की प्यास बुझाने,
बूंद न कोई बरसी।
बादल वेदों का बरसाया।। स्वामी…
लावारिस लाचार बनी,
बैठी थी अबला नारी,
अंदर का विश्वास जगाया,
हिल गई दुनियां सारी।
ऊंचे आसन पर बैठाया ।। स्वामी…
पिछड़े हुए समाज के अंदर,
आ गई नई बहारें छुआछूत और
जात-पात की तोड़ गया दीवारें।
चक्कर शुद्धि का चलाया।। स्वामी….
कितनी सदियां बीत गई हैं,
गिरते और संभलते “पथिक”
मिली न मंजिल कोई,
राह पे चलते-चलते।
सीधा रस्ता बताया ।। स्वामी….










