शान्ति का है स्रोत भीतर
शांति का है स्रोत भीतर,
नर भटकना छोड़ दे।
शांति पाने बाह्य विषयों पर
अटकना छोड़ दे।
दृष्टि अन्दर डाल कितनी,
शुद्ध गंगा बह रही है।
कर सदा तू स्नान इसमें
मल सकल छल छोड़ दे।
चाहता आनन्द जो
आनन्दमय से प्रेम कर।
इन विनश्वर वस्तुओं
से राग बन्धन तोड़ दे।
रह जगत में पर न जग
की वस्तुओं में सक्त हो।
नित्य सुख की चाह हो
तो इन से मन को मोड़ ले।
चित्त चपल तू साथ
उसको दास मन को दे बना।
प्रेम मय के ध्यान में
तू आत्मा को जोड़ दे।










