सत्यज्ञान की परिचायक
ओ३म् यस्य भूमिः प्रमाऽन्तरिक्षमुतोदरम् ।
दिवं यश्चक्रेमूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणेनमः ॥
सत्यज्ञान की परिचायक,
यह पृथ्वी जिसके चरण समान
जो इस विस्तृत अन्तरिक्ष को
रखता है निज उदर समान
शीर्ष तुल्य है जिसके शोभित,
यह नक्षत्र लोक द्युतिमान्
उस महान जगदीश्वर को
है अर्पित मेरा नम्र प्रणाम।
केचिद्वदन्ति धनहीन जनो जघन्यः,
केचिद्वदन्ति गुणहीन जनो जघन्यः
व्यासो वदत्यखिल शास्त्र गिरां प्रणेता,
नारायणस्मरण हीन जनो जघन्यः ।
इंसान खो के वक्त को पाता नहीं कभी,
जो दम गुज़र गया वह फिर आता नहीं कभी।
न दौलत कमाने में सेहत गवां,
कि सेहत न होगी तो दौलत है क्या?
बहुत शास्त्र हैं पढ़ डाले, यही एक नुक्ता सूझा है,
करो दुःख दूर दुखियों के यही ईश्वर की पूजा है।










