प्रार्थना
सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।
तेरी दया, सुगन्धि हर गुल से आ रही है ॥
रवि, चन्द्र और तारे, तूने बनाये सारे ।
उन सबमें तेरी ज्योति, बस जगमगा रही है ॥
विस्तृत वसुन्धरा पर सागर बनाये तूने ।
तह जिनकी मोतियों से अब चमचमा रही है ॥
दिन, रात, प्रातः सायं, मध्याह्न भी बनाये।
हर ऋतु पलट-पलटकर करतब दिखा रही है ॥
सुन्दर सुगन्धि वाले पुष्पों में रंग तेरा।
यह ध्यान फूल, पत्ती तेरा दिला रही है ॥
हे ब्रह्म विश्वकर्ता वर्णन हो तेरा कैसे ।
जल, थल में तेरी महिमा हे ईश छा रही है ॥
हम सब तेरी शरण हैं, तुझसे यहीं विनय है।
हो दूर यह अविद्या, हमको भुला रही है ॥










