सारे जहां में धूम मचा गये ।। (धुन-झूम बराबर झूम)
सारे जहां में धूम मचा गये ।।
सारे जहां में धूम मचा गये
धूम मचा गये धूम धूम् धूम
मचा गये धूम ऋषिवर………
पहाड़ की चोटी भयानक
गुफा कंदराओं में।
कभी बर्फीले जल में
कभी शुष्क हवाओं में।।
कभी अकेले बीहड़ वन में
कभी सभाओं में।
रहा संघर्षमय जीवन
सदा आपदाओं में।।
विध्न बाधाओं को जीवन
की एक मंजिल समझा।
जगत को कर्म क्षेत्र मोक्ष
का साहिल समझा।
मतावलम्बियों के ग्रन्थों
को नाविल समझा।
वेद भगवान को स्वाध्याय
के काबिल समझा।
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
चारों दिशाओं में घूम-घूम।।1।।
पोल जब खुलने लगी
पोप लड़खडाने लगे।
पसीने ढोंगियों को बैठ-2 आने लगे।।
उडाई धज्जियां जब
पाप अत्याचारों की ।।
धर्म के नाम पर बैठे
हुये गद्दारों की ।।
एक ही चोट में पाखण्डों
के गढ़ डहने लगे ।।
विरोधी पाप में सिन्धू में
स्वय बहने लगे।।
अकाट्य तर्क के तीरों से
कम्पित रहने लगे ।।
ऋषि कोई दैविक शक्ति है
यू सभी कहने लगे ।।
विरोधी सारे ऋषि से हारे,
गये चरणों को चूम चूम।।2।।
विदेशी राज्य में भी उसने ना,
झकना सीखा।
जिधर को चल दिये किंचित नही
रूकना सीखा।
करोड़ो थे विरोधी पर
नहीं लुकना सीखा।
ऋषि ब्रह्मज्ञानी ने नहीं
वक्त पै चुकना सीखा ।।
दया के सागर थे किंचित
किसी से वैर न था।
सभी थे अपने उनके
लिये कोई गैर न था।।
प्रभु की सृष्टि में सब
प्राणी एक सार कहा।
विश्व के सारे मनुष्यों को
एक परिवार कहा।।
कृतघ्नों ने जहर पिलाया
पी गये प्रेमी झूम झूम।।3।।
‘आदि सृष्टि से ये सब
कुछ हो रहा है भाग्य का
चिरभार मानव ढो रहा है
बस इसे ही जिन्दगी या खेल कहलो
आदमी कुछ पा रहा कुछ खो रहा है।।










