संसार के वाली ने संसार रचाया है
संसार के वाली ने
संसार रचाया है,
संसार रचा कर के,
कण-कण में समाया है।।
गरदूं में सितारों में,
मेहताब में ठंडक है,
कैसी चमक निराली है,
और सूर्य में लाली है ।
कहीं श्याम घटाओं ने,
कैसा जल बरसाया है।।
संसार रचा पतझड़ में बहारों में,
फूलों में व खारों में,
तेरा रूप झलकता है,
रंगीन नजारों में भौरों की
गुंजारों ने क्या गीत सुनाया है।।
संसार रचा कहीं निर्मल धारा है,
कहीं सागर खारा है,
कहीं गहरा पानी है,
कहीं दूर किनारा है।
जगदीश तेरी महिमा,
कोई जान ना पाया है।।
कोई चार के कंधों पर,
कोई ढोल बजा करके,
संसार रचा दुनियां से जाता है,
बारात सजाता है।
बेमोल ये सृष्टि का,
कैसा चक्र चलाया है।।…
संसार रचा










