साधना पथ पर बढ़ें हम
साधना पथ पर बढ़ें हम
बन्धनों से प्रीति कैसी
शलभ बन जलने चले हैं
सत्त्व-निज खोने चले हैं
दीप-सम जलना हमें है
दाह से फिर भीति कैसी
साधना पथ पर बढ़ें हम
बन्धनों से प्रीति कैसी
सिन्धु से मिलने चले हैं
स्वात्म हवि देने चले हैं
अतल से मिलना हमें है
शून्य तट पर दृष्टि कैसी
साधना पथ पर बढ़ें हम
बन्धनों से प्रीति कैसी
बीज सम मिटने चले हैं
वृक्ष सम उगना हमें हैं
धर्म-ध्वज के स्तम्भ बनना
देह में अनुरक्ति कैसी
साधना पथ पर बढ़ें हम
बन्धनों से प्रीति कैसी
दीप बन जलना हमें है
विश्व-तम हरना हमें है
ध्येय तिल-तिल जलन का है
कालिमा से भीति कैसी
आधार ही बनना हमें है
नींव में रहना हमें है
ध्येय जब यह बन चुका है
कीर्ति में आसक्ति कैसी










