ऋषिराज ! आज तेरा जग गान गा रहा है।
ऋषिराज ! आज तेरा,
जग गान गा रहा है।
चुपचाप चारु चेरा,
बन मान पा रहा है॥ १॥
शंकर-दिवस न आता,
शंकर न यदि मनाता।
शंकर न मूल पाता,
जो फूल ला रहा है ॥ २ ॥
पितु का निर्देश माना,
उपवास ठीक ठाना।
जग तात को जगाना,
जग को जगा रहा है ॥ ३ ॥
लखि, चीन्ह चोर चूहा,
उपजी कुपास आहा।
बढ़ बुद्धि बल विगूहा,
विभु को बता रहा है ॥ ४ ॥
शिवरात्रि सत्य ही थी,
शिव पात्रता सही थी।
शिव भारती मही थी
जिसमें ऋषि रमा रहा है ॥ ५ ॥
घनघोर था घनेरा,
अज्ञान का अँधेरा।
घर घूम घूम घेरा,
श्रुति तेज अब महा है ॥ ६॥
आचार्य आर्य आवें,
ऋषि बोध दिन मनायें।
‘जग आर्य सब बनावें’,
आदेश आ रहा है ॥ ७ ॥
बहु वेद-बोध लेवें,
जन ज्ञान दान देवें।
श्रुति का सुमार्ग सेवें,
उत्सव उठा रहा है ॥ ८ ॥
साध्वी स्त्रियाँ सती हों,
जितकाम जन यति हों।
बस आज सब व्रती हों,
व्रत दिन बता रहा है ॥ ९ ॥
शिव शान्ति पूर्ण पावें
ऋषि-बोध ज्ञान गावें।
व्रत, सूर्यसम मनावें
कल्याण कर रहा है ॥ १०॥










