ऋषि ने जलाई है, जो दिव्य ज्योति
ऋषि ने जलाई है, जो दिव्य ज्योति,
जहाँ में सदा यूँ ही जलती रहेगी।
लाखों करोड़ों को मार्ग मिलेगा,
अनेकों के जीवन बदलती रहेगी।।
अन्याय अविद्या अभावों को जग से,
हिलाने जलाने मिटाने की खातिर।
दयानन्द के जां निसारों की टोली,
कफन बाँध सर पे निकलती रहेगी।।1 ||
जिधर से भी निकलेगी जिस वक्त लेकर,
हाथों में पाखण्ड खण्डिनी पताका।
धर्म देश जाति के सब दुश्मनों को,
पैरों के नीचे मसलती रहेगी।।2।1
पहाड़ों से भिड़ना तूफानों से लड़ना,
जन्म से सिखाया है हमको ऋषि ने।
सदा मुश्किलों से निडर जूझने की,
तमन्ना दिलों में मचलती रहेगी।।3।।
सुनो ध्यान करके ए दुनिया वालों,
दयानन्द के इन दीवानों की मस्ती।
सदाचार का भाल ऊंचा करेगी,
दुराचार का सर कुचलती रहेगी।।4।।










