रेत पवन के संग मिलने पर, नभ मंडल में जाता है।
रेत पवन के संग मिलने पर,
नभ मंडल में जाता है।
पानी के संग मिल जाने पर,
फिर भूमि पर आता है।
धूंआ इतना कड़वा होता,
नहीं किसी को भाता है।
अगर तगर के संग मिलने पर,
धर्मी खूब सुहाता है।
धर्मी बारह भांति के मल हैं,
जो तेरे तन रहते हैं।
सारे तन से बहे पसीना,
आंख से आंसू बहते हैं।
मज्जा, मेद, रुधिर और विष्ठा,
शुक्र को मल ही कहते हैं।
मूत्र, ढीट और रहंट गूंग,
और कफ का दुख भी सहते हैं।
बाल्यकाल में पिता के घर में,
कहा पिता का करती है।
यौवन काल करे पति सेवा,
नहीं किसी से लड़ती है।
वृद्धावस्था शिक्षा देकर,
सुत के दुख को हरती है।
धर्मवीर स्वाधीन रहे ना,
जब तक भी वह मरती है।
जो सन्यासी बैर त्याग कर,
प्राणी मात्र से प्यार करे।
दुर्व्यसनों से दूर रहे और,
निज मन पर अधिकार करे।
योग का जो अभ्यासी हो,
और वेद का नित प्रचार करे।
धर्मवीर ऐसा सन्यासी,
भव से बेड़ा पार करे।










