#श्रेयांश_आर्य
हाल ही में शचींद्र शर्मा नामक युवक ने आर्य समाज के विरुद्ध दुष्प्रचार करने वाली एक पुस्तक अनार्योन्मूलन लिखी, जिसे द्वारका मठ के शंकराचार्य ने आशीर्वाद दिया। तब किसी हिन्दू ने यह प्रश्न नहीं उठाया कि इस कृत्य से हिन्दू एकता को क्षति पहुँचती है और हमारे वास्तविक विरोधी तो ईसाई तथा मुसलमान हैं। सबने मौन साध रखा।
यह घटना उन आर्यसमाजियों की आँखें भी खोलने वाली है, जो हिन्दुत्व के नाम पर पौराणिक पाखण्डों के विषय में मौन धारण कर लेते हैं। पौराणिक पाखण्ड उस साँप के समान है, जो आपकी आस्तीन में छिपा रहेगा और अवसर मिलते ही डसेगा। अतः पौराणिक पाखण्डों का भी यथोचित खण्डन आवश्यक है।
आर्य समाज ने हिन्दू एकता का ठेका नहीं ले रखा है। आर्य समाज ने सत्य का ठेका लिया है; हमारा मूल कार्य वेद आदि सत्य शास्त्रों का प्रचार है, न कि हिन्दुत्व के नाम पर झूठे पाखण्ड का प्रचार।
हिन्दू समाज को यह शर्म आनी चाहिए कि वह यह भी भूल गया कि जब हैदराबाद में मंदिरों पर पाबंदियाँ लगाई गईं, तब उनके विरुद्ध आवाज कौन उठा रहा था? उस समय तत्कालीन हिन्दू मठाधीश कहाँ थे?
- 1.
- सन् 1924 में ख़्वाजा हसन निज़ामी ने ‘दाई-ए-इस्लाम’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें बताया गया था कि हिन्दुओं को किस प्रकार मुसलमान बनाया जाए, और इसके लिए अनेक उपायों का वर्णन किया गया था। इस पुस्तक के विरोध में स्वामी श्रद्धानंद जी ने ‘ख़तरे की घंटी’ नामक पुस्तक लिखकर हिन्दुओं को सावधान किया। उन्होंने हिन्दुओं को चेताया कि यह केवल एक धार्मिक विवाद नहीं, बल्कि अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न है। (स्रोत–आर्य समाज शुद्धि आंदोलन, लेखक–डॉ. विवेक आर्य)
- 2.
- अब्दुल्लाह नामक व्यक्ति ने हिन्दू देवी-देवताओं की कठोर आलोचना और निंदा करते हुए ‘तोहफ़तुल-हिन्द’ (भारत की सौगात) नाम से उर्दू में एक पुस्तक प्रकाशित की थी। पं. लेखराम जी के अनुसार इस पुस्तक से अनेक अज्ञानी हिन्दू मुसलमान बने। ऐसी विकट स्थिति में मुरादाबाद निवासी मुंशी इन्द्रमणि ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए ‘तोहफ़तुल इस्लाम’ (इस्लाम का उपहार) नाम से फारसी में एक पुस्तक लिखी। सैय्यद महमूद हुसैन ने इसके खंडन में ‘खिलअत-अल-हनूद’ नामक पुस्तक छापी। उसके प्रत्युत्तर में मुंशी जी ने ‘पादाशे इस्लाम’ नामक पुस्तक छापी। इसके तीन वर्ष पश्चात् मुंशी जी ने एक मुसलमान द्वारा लिखी गई ‘असूले दीने हिन्दू’ (हिन्दू धर्म के सिद्धांत) नामक पुस्तक का उत्तर देने के लिए ‘असूले दीने अहमद’ (इस्लाम के सिद्धांत) नाम से पुस्तक लिखी। इस पर मुसलमानों ने अत्यंत अश्लील पुस्तकें ‘तेगे फकीर बर गर्दने शरीर’ (दुष्ट व्यक्तियों की गर्दन पर फकीर की तलवार) और ‘हदिया उल असलाम’ छापीं। इसके जवाब में मुंशी जी ने ‘हमलये हिन्द’, ‘समसामे हिन्द’ और ‘सौलते हिन्द’ नामक तीन पुस्तकें मेरठ से छपवाईं। (आर्य समाज और शुद्धि आंदोलन, लेखक डॉ. विवेक आर्य, पृष्ठ संख्या 448)
- 3.
- भारत देश की छवि धूमिल करने के लिए मिस कैथरीन ने अनहैप्पी इंडिया लिखी, जिसका प्रत्युत्तर श्रीमती चंद्रावती लखनपाल जी ने मदर इंडिया का जवाब लिखकर दिया (आर्य समाज का इतिहास, डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकार, भाग 5, पृष्ठ संख्या 610), तथा लाला लाजपत राय जी ने दुखी भारत लिखकर दिया।
- 4.
- आर्य समाज ने हिन्दू विधवाओं के उद्धार के लिए दिनांक 24 मार्च 1935 को होशियारपुर (पंजाब) में एक शास्त्रार्थ किया, जिसका विषय था “क्या सनातन धर्म में विधवा विवाह शास्त्रसम्मत है अथवा नहीं?” एक ओर थे आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वान ठाकुर अमर स्वामी सरस्वती जी (शास्त्रार्थ महारथी), जो विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में खड़े थे। दूसरी ओर थे पंडित कालूराम शास्त्री तथा उनके सहायक पंडित अखिलानंद कविरत्न, जिनका मत था कि विधवा स्त्रियाँ जीवनभर दयनीय अवस्था में पड़ी रहें, यही धर्म और मर्यादा है। इस शास्त्रार्थ के प्रधान थे पंडित मूलराज शर्मा। इस शास्त्रार्थ में विजय आर्य समाज के विद्वान की हुई। (स्रोत–निर्णय के तट पर, भाग-1) यदि आर्य समाज इन कुरीतियों के विरुद्ध खड़ा न हुआ होता, यदि उसने इन तथाकथित सनातनियों से शास्त्रार्थ न किया होता, तो न जाने आज भी कितनी स्त्रियाँ सफेद वस्त्रों में कैद होकर हिन्दू पंडों की क्रूरता को “धर्म” समझकर ढो रही होतीं।
- 5.
- दिल्ली के फव्वारा चौक पर जब ईसाई पादरी प्रतिदिन हिन्दू धर्म के विरोध में व्याख्यान देते थे, तब समस्त हिन्दू समाज की ओर से निर्भीक स्वर में उत्तर देने वाले एकमात्र आर्य समाजी विद्वान थे – पंडित रामचंद्र देहलवी जी। उन्होंने हिन्दू धर्म के पक्ष में बिना किसी अवकाश के निरंतर 14 वर्षों तक प्रतिदिन व्याख्यान दिया। (स्रोत– पंडित रामचंद्र देहलवी और उनका वैदिक दर्शन, लेखक प्रोफेसर राजेंद्र जी जिज्ञासु)
- 6.
- सन् 1947 के विभाजनकाल में चारों ओर भय, असुरक्षा और साम्प्रदायिक उन्माद का वातावरण था। उस समय कराची की धनपतमल आर्य कन्या पाठशाला में हजारों हिन्दू शरणार्थी भारत जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी योजनाबद्ध रूप से सैकड़ों उन्मादी तत्वों ने आक्रमण कर दिया। उसी समय आर्यवीर दल, सिंध प्रान्त के प्रमुख कार्यकर्ता श्री नारायणराव लाठी लेकर शत्रुओं से जा भिड़े। प्रचण्ड संघर्ष हुआ और वे धर्म-रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। (स्रोत–भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आर्य समाज का योगदान, लेखक आचार्य सत्यप्रिय शास्त्री)
- 7.
- महाराष्ट्र राज्य के बीड़ जिले के अंतर्गत एक स्थान धारुर है। 1940 के दशक में एक बार नगर के एक मकान में हिन्दू देवियाँ सत्संग कर रही थीं। उसी समय मुस्लिम गुण्डों ने अवसर पाकर उस स्थान पर हमला बोल दिया। देवियों की रक्षा हेतु आर्यवीर दल के दो वीर लाठियाँ लेकर गुण्डों से भिड़ गए। संघर्ष के दौरान एक गुण्डे ने निशाना साधकर एक बड़ा पत्थर एक आर्यवीर को मारा। पत्थर की चोट से उस आर्यवीर का घुटना टूट गया और वे भूमि पर गिर पड़े। उन्होंने अपने दूसरे साथी से दृढ़ स्वर में कहा, “तुम देवियों को मकान के पिछले हिस्से से सकुशल बचाकर ले जाओ, इधर मैं इन गुण्डों को रोके रखता हूँ।” उनके इस अदम्य साहस के कारण देवियाँ सुरक्षित बच गईं। परन्तु गुण्डों ने उस आर्यवीर को पकड़ लिया और घसीटते हुए चौराहे पर ले जाकर बाँध दिया, और उसे जीवित ही अग्नि में जला दिया।
यह तो कुछ ही घटनाएँ हैं, आर्य समाज का 150 वर्षों का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है। हिन्दुओं द्वारा आर्य समाज का किया जा रहा विरोध उन्हीं के लिए घातक सिद्ध होगा, क्योंकि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में लिखा है कि आर्य समाज हिन्दुत्व की खड्गधर बाँह साबित हुआ।
शचींद्र शर्मा तो मूर्ख है, उसे उत्तर देना ही मूर्खता है। किंतु उसकी पुस्तक पर सम्मति देने वालों का क्या कहना! वैसे कथित सनातनियों ने जब भी आर्य समाज के विरोध में मोर्चा खोला है, उन्हें उल्टे पैर ही भागना पड़ा है – जैसे 1963 में आर्य प्रतिनिधि सभा, बम्बई प्रदेश के उपदेशक श्री वेदमित्र ठाकोर पर वेद विज्ञान पत्रिका में भागवत के संबंध में अत्रि स्मृति का श्लोक प्रकाशित करने के कारण मुकदमा चलाया गया। लगभग डेढ़ वर्ष तक चले इस मुकदमे में आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री ने 24–25 जून को प्रभावशाली साक्ष्य दिया। 30 जून 1964 को न्यायमूर्ति ए. के. शाह ने श्री वेदमित्र ठाकोर को निर्दोष घोषित कर मुकदमे से मुक्त कर दिया। इस प्रकार यह प्रकरण आर्य समाज के लिए एक उल्लेखनीय न्यायिक विजय के रूप में दर्ज हुआ। (स्रोत: डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकार, आर्य समाज का इतिहास, भाग 7, पृ. 251–253)
घटनाएँ बहुत हैं, सभी देना संभव नहीं है। किंतु बुद्धिमान इतने से ही आकलन कर लें।
शीघ्र ही शचींद्र शर्मा द्वारा कल्पित अनार्योन्मूलन पुस्तक का उत्तर दिया जाएगा। आर्य युवकों की गति भले ही धीमी हो, पर चोट गहरी पहुँचाएगी। जिस अभद्र भाषा-शैली में कुतर्क किए गए हैं, उत्तर भी उसी तीव्रता से दिया जाएगा। दर्द वैसा ही होगा, जैसा हमारे आर्य विद्वानों यथा पंडित मनसाराम जी, पंडित तुलसीराम जी, पंडित शिवशंकर शर्मा ‘काव्यतीर्थ’, अमर स्वामी सरस्वती, शिवपूजन सिंह कुशवाहा, पंडित युधिष्ठिर मीमांसक,बिहारीलाल शास्त्री आदि को देखकर पाखण्डी पंडों जिनमें विशुद्धानंद, बालशास्त्री, अंबिकादत्त व्यास, राजा शिवप्रसाद सिंह, माधवाचार्य शास्त्री, कालूराम शास्त्री, अखिलानंद कविरत्न, स्वामी करपात्री महाराज, निरंजनदेव तीर्थ आदि को हुआ करता था।हा यह बात सत्य है कि, हमारे विद्वान चाहे कितने ही कुशल वक्ता हो गए, पर कुत्तों की भांति भौंक नहीं सके, इसलिए हम भी वह नहीं कर सकते किंतु उत्तर देने का सामर्थ्य रखते थे अतः हम भी उत्तर देने का सामर्थ्य रखते है।
अस्तु
























