रथ में बैठा है सारथि अश्व को करे काबू
रथ में बैठा है सारथि
अश्व को करे काबू
वो है आत्मा जो सुपथ का ही
तो कामत-कारु
मन के द्वारा वह गति
अश्वों की करता संयत
है कुशल सारथि की
महिमा का अद्भुत जादू
रथ में बैठा है सारथि
अश्व को करे काबू
वो है आत्मा जो सुपथ का ही
तो कामत-कारु
वृत्तियाँ मन की हैं
किरणों की चमकती ख्याति
अन्तरात्मा के सूर्य किरणों की
हैं यह स्वाति
मनोदेव आत्मा ही करता है
वश में बाह्य जगत्
मन-संकल्प वृत्तियों की
महिमा करो अनुभव
रथ में बैठा है सारथि
अश्व को करे काबू
वो है आत्मा जो सुपथ का ही
तो कामत-कारु
बागडोरों को थामो दृढ़ता से
ऐ सारथी कुशल!
खुद पे शासन करो
फैला दो चहुं दिशी मङ्गल
अपनी इच्छाओं से ले जाओ
रथ जहाँ चाहो
बाह्य सन्सार में तुम प्राप्त
ज्योति फैला दो
रथ में बैठा है सारथि
अश्व को करे काबू
वो है आत्मा जो सुपथ का ही
तो कामत-कारु
आत्मावशी होके इन्द्रियों को
बांधो मन-डोर से
इ्न्द्रियाँ पाएँगी संयम-सौहार्द
सब ओर से
दसों इन्द्रियाँ करें कर्म-ज्ञान-गति गौर से
क्यों न फिर पाओगे आशीष
प्रभु की ओर से
रथ में बैठा है सारथि
अश्व को करे काबू
वो है आत्मा जो सुपथ का ही
तो कामत-कारु
मन के द्वारा वह गति
अश्वों की करता संयत
है कुशल सारथि की
महिमा का अद्भुत जादू
रथ में बैठा है सारथि
अश्व को करे काबू
वो है आत्मा जो सुपथ का ही
तो कामत-कारु










