– श्री ओ३म् प्रकाश त्यागी, संसद सदस्य
आज संसार के विचारकों व इतिहासकारों के सम्मुख एक महान आश्चर्यजनक प्रश्न यह बना हुआ है कि लगातार शताब्दियों तक ऐसे विदेशी आक्रान्ता शासकों ने भारतीय राष्ट्र तथा आर्य जाति को समूल नष्ट कर इसकी लाश पर अपने अनुकूल नए राष्ट्रों को जन्म देने के लिए लोभ- लालच, छल-कपट, बल, वर्बरता, आदि सभी अमानवीय व घृणित उपायों का अवलम्बन लिया। तथापि लम्बी दासता में रह चुकने के पश्चात् भी यह राष्ट्र अपनी चेतना, स्वाभिमान तथा जीवन की रक्षा कैसे कर सका ? इस प्रश्न का सारांश में उत्तर यही है कि यों तो भारत में विदेशी आक्रा- न्ताओं के आगमन से ही यहां समय-समय पर ऐसे अनेकों देश भक्त राजा, नेता व विद्वान हुए हैं जिन्होंने भारत की स्वतन्त्रता व स्वाभिमान को बनाये रखने का प्रशंसनीय प्रयास किया। परन्तु वर्तमान भारत में दिखाई पड़ने वाली स्वतन्त्रता, राष्ट्रीय चेतना व स्वाभिमान पूर्ण जीवन महर्षि दयानन्द सरस्वती और उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज की ही देन है। यदि महर्षि दयानन्द और आर्य समाज का अवतरण न होता तो भारत का राष्ट्रीय स्वरूप क्या होता, इसकी कल्पना करना कठिन है।
सन् १८५७ की महान क्रान्ति के पश्चात् जब भारत में स्वतन्त्रता व स्वराज्य का नाम तक लेना अपनी मृत्यु को स्वयं निमंत्रण देना समझा जाता था, जबकि विदेशी अंग्रेजी प्रशासक लार्ड मैकाले की योजनानुसार शिक्षा संस्थाओं के द्वारा भारत की भाषा, धर्म, संस्कृति, साहित्य व इतिहास को समाप्त कर ईसाई राष्ट्र को जन्म देने का भरसक प्रयास किया जा रहा था, जबकि विदेशी विद्वान आर्य जाति के मूल धर्म-ग्रन्थ वेदों को असभ्य गड़रियों के गाने तथा रामायण-महाभारत को काल्पनिक गाथाएं सिद्ध कर रहे थे। ऐसी विकट परिस्थिति में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इसके उद्धार करने की प्रतिज्ञा ली और उसे चरितार्थ करने के लिए सन् १८७५ में बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की ।
राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने की दृष्टि से महर्षि दयानन्द सरस्वती ने देश में सर्वप्रथम सर्व-क्रान्ति का नारा दिया और धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों में एक ऐसी नवीन क्रान्ति को जन्म दिया जिससे समूचे भारत में देखते-देखते खलबली मच गई। बहुत से अज्ञानी व्यक्तियों ने उनकी आन्तरिक वेदना व लक्ष्य को न समझ कर उनका विरोध भी किया, उन पर पत्थर मारे, उन्हें जहर दिया। परन्तु वह निर्भीक महान क्रान्तिकारी संन्यासी सभी विघ्न-बाधाओं को पार करता हुआ निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता गया ।
देशवासियों की पराधीनता के कारणों का आभास कराने के लिए उन्होंने कहा कि स्वायभुव राजा से लेकर पाण्डव पर्यन्त आर्यों का चक्रवर्ती राज्य रहा। तत्पश्चात् वे आपस के विरोध से लड़कर नष्ट हो गए क्योंकि इस परमात्मा की सृष्टि में अभिमानी, अन्यायकारी, अविद्वान लोगों का राज्य बहुत दिन नहीं चलता।
भारत को जंगली व असभ्य लोगों का देश और इनके महान ग्रन्थ वेद को असभ्य गड़रियों के गाने सिद्ध करने वाले विदेशी विद्वानों को उत्तर देते हुए महर्षि ने इन शब्दों के द्वारा देशवासियों के अन्दर स्वाभिमान की भावना भरते हुए कहा – “यह निश्चय है कि जितनी विद्या और मत भूगोल में फैले हैं वे सब आर्यावर्त्ततं देश से ही प्रचारित हुए हैं।”
सन् १८५७ की महान क्रान्ति के पश्चात् आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ही वह महापुरुष थे जिन्होंने सर्वप्रथम स्वराज्य, स्वदेशी, स्वभाषा (राष्ट्रभाषा हिन्दी) की प्रेरणा देशवासियों को दी। उन्होंने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा कि “माता-पिता के तुल्य विदेशी राज्य के अच्छा होते हुए भी वह स्वराज्य से अच्छा कदापि नहीं हो सकता।” इस तथ्य को थ्योसिफिकल सोसायटी की प्रसिद्ध नेत्री श्रीमती ऐनीबिसेण्ट ने स्वीकार करते हुए कहा कि – “महर्षि दयानन्द ने ही सवं प्रथम नारा लगाया था कि- भारत भारतीयों का हो।”
सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत
जन्म-गत जाति-पांत छूत-छात संकीर्ण साम्प्रदायिकताओं, मत-मता- न्तरों आदि अनेक सामाजिक कुरीतियों से जर्जरित व विघटित राष्ट्र को एक सूत्र में लाने के लिए महर्षि दयानन्द और आर्य समाज ने बड़ा ही प्रशंसनीय कार्य किया। सर्वप्रथम उन्होंने सभी धार्मिक वर्गों व मत-मतान्तरों को एक मत होने के लिए दिल्ली दरबार के समय एक सर्वधर्म सम्मेलन बुला कर प्रयास किया। उसमें असफल हो जाने पर उन्होंने सभी समुदायों में धर्मके नाम पर फैले पाखण्डवाद व असत्य एवं संकीर्ण साम्प्रदायिक विचारों का बड़ी कड़ाई से खण्डन किया ।
जन्म से कोई छोटा-बड़ा, छूत-अछूत नहीं होता, अपितु अपने गुण, कर्म व स्वभाव से व्यक्ति छोटा-बड़ा बनता है। इस सिद्धान्त का दयानन्द ने वेद शास्त्रों के प्रमाणों से प्रतिपादन ही नहीं किया अपितु आर्य समाज ने उनके इस विचार को क्रियात्मक रूप देते हुए सर्वत्र अपने उत्सवों व सम्मे- लनों पर सहभोजों का आयोजन कर और गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देकर राष्ट्रीय एकता की दिशा में देश- बासियों को अग्रसर किया।
महर्षि दयानन्द और आर्य समाज द्वारा की गई उक्त सामाजिक क्रान्ति के सम्बन्ध में माडर्न रिव्यू के यशस्वी सम्पादक श्री रामानन्द चटर्जी ने अपने पत्न में लिखा है कि “स्वामी दयानन्द भारत को सननीतिक, सामाजिक और धार्मिक रूप से एक सूत्र में बांधना चाहते थे। भारत की एक राष्ट्र का रूप देने के लिए उन्होंने भारत को विदेशी शासन से मुक्त कराना चाहा। सामाजिक दृष्टि से देशवासियों को एक करने के लिए उन्होंने जात-पात और वर्ग भेद को मिटाना चाहा ।
भारत की भाषा, धर्म, संस्कृति, साहित्य, इतिहास, देश-भक्ति आदि को समाप्त करने की दृष्टि से बनाई लार्ड मैकाले की शिक्षा-योजना को विफल कर देश के छात्र-छात्राओं में अपनी भाषा, धर्म, संस्कृति आदि के प्रति अगाध श्रद्धा व स्वाभिमान भरने के लिए महर्षि की योजनानुसार आर्य समाज ने उत्तर भारत के लगभग सभी प्रान्तों में गुरुकुलों, स्कूलों, कालेजों की स्थापना की। प्रमाण-स्वरूप जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में वहां की गोरी सरकार की रंग-भेद नीति के विरुद्ध सत्या- ग्रह कर रहे थे तो गुरुकुल कांगड़ी के विद्यार्थियों ने अपने नित्य का घी-दूध त्याग कर और दूधियां बांध पर मजदूरी करके धन जमा किया और गांधी जी की सहायतार्थ भेजा। यही कारण था कि भारत आने पर गांधी जी सर्वप्रथम गुरुकुल कांगड़ी में उन देश भक्त बच्चों को आशीर्वाद देने गये ।
स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय योगदान
जब स्वर्गीय गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस का स्वतन्त्रता आन्दोलन चला तो आर्य समाज ने अनुभव किया कि उनके द्वारा राजनीतिक क्षेत्र में महर्षि दयानन्द के स्वप्नों को साकार किया जा सकता है। स्वामी श्रद्धानंद, श्री स्व० लाला लाजपतराय, श्री भाई परमानन्द आदि सभी प्रमुख आर्य नेता और आर्य नर-नारी व्यक्तिगत रूप से स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े। उस समय सर्वत्त आर्य समाज बाहर से धार्मिक संगठन बना रहा, परन्तु आंत- रिक रूप से कांग्रेस के साथ हो गया और आजादी की लड़ाई में नींव के पत्थर बनकर खड़ा हो गया। आर्य समाज द्वारा की गई इस राष्ट्रीय चेतना को स्वर्गीय विपिन चन्द्र पाल जी ने अपने ग्रन्थ वर्तमान भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन का प्रारम्भ के अन्दर इन शब्दों में प्रकट किया कि “यह दयानन्द ही था जिसने उस आंदोलन की आधार शिला रखी जो बाद में धार्मिक राष्ट्रीयता के नाम से जाना गया। उनके आंदोलन ने उन हिन्दुओं में एक नवीन राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न की, जो शताब्दियों से आत्महीनता के गर्त में पड़े थे। और साथ ही देश की जनता को वेद के आधार पर स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व की भावना प्रदान की।”
भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए क्रान्तिकारी आंदोलन के जन्म- दाता स्वर्गीय श्यामजी कृष्ण वर्मा को मपि दयानन्द जी ने ही अपने व्यय से इंग्लैंड में विशेष शिक्षा प्राप्त करने व भारतीय धर्म संस्कृति, स्वातन्त्र्य-प्राप्ति की आग फूंकने की दृष्टि से भेजा था। उन्होंने इंग्लैंड जाते ही सन् १६०५ में इंडियन होम रूल सोसायटी की स्थापना की जिसका लक्ष्य भारत के लिए स्वराज्य प्राप्ति था। उन्होंने भारतीय समस्याओं पर विचार प्रकट करने के लिए वहां इंडिया हाउस की भी स्थापना की और अपने विचारों को प्रकट करने के लिए इंडियन सोशलिस्ट नामक पत्र भी निकाला । सन् १६१६ में आर्य समाज के प्रसिद्ध नेता श्री लाला लाजपतराय जी ने अमरीका जाकर भारत की स्वतन्त्रता के लिए वहां वातावरण उत्पन्न करने की दृष्टि से इंडियन होम रूल लीग नामक संस्था की स्थापना की। उन्हीं के प्रचार का परिणाम था कि अमरीका की जनता व सरकार सदैव भारत की स्वतन्त्रता का समर्थन करती रही।
अंग्रेज सरकार ने साहस करके आर्य समाज को राजनीतिक व बागी सिद्ध करने के लिए पटियाला रियासत में इस पर केस चलवाया और लगभग ८५ आर्य समाजियों के विरुद्ध पुलिस द्वारा वारण्ट निकाले गए और आर्य समाज के सत्यार्थ प्रकाश आदि सभी ग्रन्थों पर वहाँ की रियासत द्वारा प्रतिबन्ध लगाया गया परन्तु अंग्रेज सरकार के लाख प्रयत्न करने पर भी वहाँ की सरकार अपने पक्ष को सिद्ध न कर सकी और पटियाला सरकार द्वारा केस वापिस ले लिया गया । आर्य समाज ने ही भारत में राष्ट्रीय चेतना व स्वाभिमान को जन्म दिया। इसकी सिद्धि के लिए अन्त में दो महान विदेशी विद्वानों का मत उद्धृत करना उचित होगा। श्री डी० बैबले के विचारों- “वर्तमान माडर्न स्वतन्त्र भारत की वास्तविक आधारशिला दयानन्द ने ही रक्खी थी। दुर्भाग्यवश अन्य आधारशिलाओं की भांति इस आधारशिला को भी हम देख नहीं सकते हैं- फिर भी हम इस पर दृष्टिपात कर सकते हैं और इस पर बने भवन की प्रशंसा कर सकते हैं तथा इस तथ्य को हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि योग्य से योग्य भवन निर्माण बिना नींव के नहीं बन सकता है चाहे वह आधारशिला अदृश्य ही क्यों न हो।”
फ्रांस के प्रसिद्ध विश्व-विख्यात विद्वान श्री रोम्यां रोलां लिखते हैं कि-“राष्ट्रीय पुनर्जागरण में जो इस समय देश में देख पड़ रहा है, स्वामी दयानन्द ने प्रबल शक्ति के रूप में कार्य किया। उनके आर्य समाज ने इच्छा व अनिच्छा पूर्वक बंगाल के १६०५ के विप्लव का मार्ग बताया था। दया- नन्द सदैव सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करते थे कि उनका समाज अराजनीतिक है और ब्रिटिश गवर्नमेंट का निर्णय इससे भिन्न था। दयानन्द राष्ट्रीय संगठन और पुर्नानर्माण का सर्वाधिक मसीहा था ।










