रस बरसत चहुं दिशि से आज।

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रस बरसत चहुं दिशि से आज।

रस बरसत चहुं दिशि से आज।
ब्रह्म तप सुलझे मोरे सगरे काज।।टेक ।।

ऋत व्यवस्था का मैं हूं साधक।
ओऽम् दिव्य का हूं आराधक।
गुनि जीवन में वेद आवाज ।। १ ।।

इत उत तित उसकी ही छवि है।
विमल धवल ज्यों प्रातः रवि है।
मौन गूंज है गहन आभास ।। २ ।।