‘रचना तुम्हारी प्यारी प्रभु’
‘रचना तुम्हारी प्यारी प्रभु’ लाजवाब है
पृथ्वी पहाड़ चाँद कही आफताब है।
कोयल कहीं कूँ कूँ की यूँ
रटे लगा रही पंचम के स्वर में
मानो मधुर गीत गा रही,
मस्ती में मोर नाचता यूँ पी शराब है।
रचना तुम्हारी प्यारी प्रभु..
इस आत्मा के रथ को
कैसा सजाया मन को
लगाम सारथी बुद्धि को
बनाया नर नारियों के
जाल का कैसा हिसाब है।
रचना तुम्हारी प्यारी प्रभु…
परमात्मा है ही नहीं,
ऐसा जो मानते
दुनिया बनानेवाले को,
जो ना पहचानते
उनके दिमाग का कोई,
पुरजा खराब है।
रचना तुम्हारी प्यारी प्रभु…
पृथ्वी, पहाड़, चाँद सितारे
चल रहे किसके इशारे पर ये
मौसम बदल रहे नंदलाल
इसका नास्तिक ना बेजबाब है।
रचना तुम्हारी प्यारी प्रभु लाजबाब है।
पृथ्वी, पहाड़, चाँद कहीं आफताब है।










