प्रसन्न है जो प्रसन्न रहें रूठे जो रूठे रहने दो ।

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प्रसन्न है जो प्रसन्न रहें रूठे जो रूठे रहने दो ।

प्रसन्न है जो प्रसन्न रहें रूठे
जो रूठे रहने दो ।
दिल में एक गुब्बार उठा है
मत रोको मुझे कहने दो।।

ऊंच नीच का भेद मिटाकर
जिन्हें समाज ने मिला लिया।
इन कुर्सी के मतवालों ने
हरिजन उनको बना दिया।।

हम चाहते थे महिलाओं को
बनाना सुलभा गार्गी सिया।
इन धूर्तों ने नारी को देखों
कैसे पथभ्रष्ट किया।।
मेरे शब्दों की चोट लगे
जिनको उनको दुख सहने दो।।1।।

धर्मनिरपेक्ष राज कह करके,
देश का चालोचलन बिगाड़ा ।।
सह शिक्षा अनिवार्य करके,
छात्रों का आचरण बिगाड़ा।
शराब अंडे और मांस खिलाकर,
शुद्ध सात्विक भोजन बिगाड़ा
तन भी बिगाड़ा मन भी बिगाड़ा
रहन सहन सब साधन बिगाड़ा
सच्चाई के गोलों से पापों के
दुर्ग को ढहने दो।।2।।

प्रान्त और भाषावाद बढ़ाकर
देश के हिस्से काट दिये।
मजहब की दीवारों अन्दर
सब नर नारी फाँट दिये ।।

कुछ को खुली छूट दे दी
कुछ बुरी तरह से डांट दिये।
लाइसैंस कोटे पद धरती
सारे अपनों को बांट दिये ।।
आज छिपे हुये अरमानों को
आँसू बनकर बहने दो।।3।।

बहुत कोध आता है मुझे
इन कुर्सी के उनमत्तों पर ।।
पेड़ की जड़ में आग लगी जल,
छिडक रहे हैं पत्तों पर।

शहद प्राप्त करना चाहते हैं
हाथ भिड़ों के छत्तों पर।।
देश की बली चढ़ा रहे पापी
कुर्सी भाषण भत्तों पर।
शोभाराम ‘प्रेमी’ को अब
तक दहा हैं अब मत दड़ने दो।।4।।