प्रभु निराकार है, लेता ना अवतार है
प्रभु निराकार है,
लेता ना अवतार है
हर प्राणी में रमा हुआ है,
जग का पालनहार है।
जिसने यह संसार रचाया,
उसकी रचना करते हैं।
सुन्दर-सुन्दर कपड़े, जेवर,
पहनाकर के धरते हैं।
प्रतिमा करते तैयार हैं,
कहते यह करतार है,
शंख बजाकर पीतल कटें
करते जय-जयकार हैं।।1।।
प्रभु निराकार है, लेता ना………
जो जग का है पालनकर्ता,
उसका पालन करते हैं।
उसकी भूख मिटाने को,
भोजन भी आगे धरते हैं।
कैसा गलत विचार आया है,
करके बन्द किवार हैं,
भोग लगायें प्रेम से,
कहै, पुकार पुकार।।2।।
प्रभु निराकार है, लेता ना…..
पत्थर तक के कीड़ों को भी,
भोजन प्रभु पहुँचाता है।
है बुद्धि मति मन्द उसे,
जो प्रतिदिन भोग लगाता है,
वह सच्चा करतार है,
जिसको ना एतबार है,
डूबेगा मझधार में,
ना होगा बेड़ा पार है।।3।।
प्रभु निराकार है, लेता ना……
जैसा कोई कर्म करे,
प्रभु वैसा न्याय चुकाता है।
छिपा नहीं रह सकता,
सारा लिखा वही में पाता है।
जीवन ही बेकार है,
प्रभु से ना गर प्यार है, ‘
राघव’ उस अपरम्पारी की,
माया अपरम्पार है।।4।।
प्रभु निराकार है, लेता ना…….










