प्रभु को भूल गये,लोग इस जमाने में
प्रभु को भूल गये,
लोग इस जमाने में
सिर्फ सुख समझे हैं,
पीने और खाने में।।
जर जमीं जन पे,
जिन्दगी को लुटाते
देखा जोर जब्र जुल्म से,
जायदाद जुटाते देखा।
उम्र बदफेलियों में,
व्यर्थ लुटाते देखा इक पल
भी न कभी प्रभु गुण गाते देखा।
मस्त दिन-रात रहें,
मौज ही मनाने में।।
सिर्फ सुख कामना सुख की,
विषयों से किया करते हैं
चाह अमृत की है पर,
विष ही पिया करते हैं।
सिर्फ निज स्वार्थ के हित,
जग में जिया करते हैं एक
कौड़ी न दुःखियों को,
थैलियां खोल रहे,
नर्तकी नचाने में।।
सिर्फ सुख शराबियों ने कहा है,
मजा मयखाने में तवायफों ने कहा है,
अदा दिखाने में। जुआरियों ने कहा,
दाव के पड़ जाने में चुगलखोरें ने कहा,
आग के सुलगाने में।
कहा सन्तों ने मजा है,
प्रभु गुण-गाने में।।
सिर्फ सुख बिना भगवान के,
आनन्द कहां मिलता
है कृपा से उसकी,
सुख सुमन हृदय में खिलता है।
उसकी सत्ता के बिना,
पत्ता तक न हिलता है
उसकी मर्जी के बिना,
फूल भी न खिलता है।
वही समर्थ सकल
सृष्टि के रचाने में।।
सिर्फ सुख मुक्ति मिलती न,
तीर्थों में नित भटकने
से मुक्ति मिलती न,
पत्थरों पे सर पटकने से।
मुक्ति मिलती न,
मुख से राम-राम रटने
से मुक्ति मिलती न,
कभी कृष्ण-कृष्ण कहने से।
मुक्ति मिलती है,
शुद्ध आचरण बनाने से।।
सिर्फ सुख….
न मिली शान्ति,
सिकन्दर के रण
प्रयाणों में न मिली शान्ति,
न मिली शान्ति, न मिली शान्ति,
बोनापार्ट के अरमानों में।
कौरवों के धनुष बाणों में
गजनवी के उन खजानों में।
शान्ति कवि इन्द्र प्रभु की
शरण में जाने में।।
सिर्फ सुख….










