ओ३म् सत्यं शिवं सुन्दरम् है
ओ३म् सत्यं शिवं सुन्दरम् है,
सर्व व्यापक है सीमा नहीं है।
सच्चिदानन्द घट-घट समाया,
वैसी महिमा किसी की नहीं है ॥ टेक ॥
ओ३म् है व्योम सागर धरा में,
वह है सरिता में, गिरी कन्दरा में।
वह पवन में भी है अंगिरा में,
वह है हर श्वांस में हर शिरा में ॥ टेक ॥
सूर्य की दहदहाती दहक में,
शुभ चन्दा की शीतल चमक में।
कुञ्ज कलियों की मोहक महक में,
पक्षियों की मधुर चहचहक में ॥ टेक ॥
हे अजन्मा मगर जन्मदाता,
सृष्टिकर्ता है सब सिद्धि पाता।
परम ज्ञानी है पावन विधाता,
कोई भी उसकी उपमा नहीं है ॥ टेक ॥
न्यायकारी है फिर भी दयालु,
कर कृपा दीनबन्धी कृपालु ।
मुक्तिदाता तुझे कैसे पा लूँ,
अनन्त तेरी गरिमा सही है॥ टेक ॥
वह अनादि है, अनहद है,
अनुपम, अजर है, अमर और अभय।
है निराकार निर्विकार नित्य,
उसकी कोई भी प्रतिमा नहीं है ॥ टेक ॥
वन में है ग्राम में हर नगर में,
वह है हर मोड़ पर हर डगर में।
अखिल विश्व में चर-अचर में,
वह है गतिमान प्रतिपल प्रहर में ॥ टेक ॥
हे परमब्रह्म परमेश्वर वंदन,
नमन कर रहे आर्यजनगण।
सबसे आधार ही तुम हो भगवन्,
दूसरा विश्वकर्मा नहीं है
शक्ति दो हम बनें कर्म भूषण,
भक्ति दो हम बनें धर्म-भूषण।
सत्य का हो सदा हमसे पोषण,
हो न पाये किसी का भी शोषण।
यज्ञ से दूर हो सब प्रदूषण,
वेद विद्या का हो नित निरूपण।
ना रहे शेष कोई भी दूषण,
भावना हम सभी की यही है।
कामना हम सभी की यही है ।
प्रार्थना हम सभी की यही है ।










