ओछी संगत बैठकर पीने लगा शराब

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ओछी संगत बैठकर पीने लगा शराब

ओछी संगत बैठकर पीने लगा शराब

ओछी संगत बैठकर पीने लगा शराब।
धर्म गया इज्जत गई हो गई अकल खराब॥

जो आए सो बक रहा पड़ा कीच के बीच।
गाली दे पितु मात को सौ नीचों का नीच॥

चढ़ा नशा दुर्गन्ध का बात बात तकरार।
सदा शरारत सूझती उल्ट पुल्ट व्यवहार॥

सुध बुध खोकर एक दिन कर बैठा उत्पात।
कत्ल किया इन्सान का रंगे खून से हाथ॥

जुर्म किया कैदी बना हो गई मस्ती दूर।
अब पछताए क्या बने आदत से मजबूर॥

बरतन भांडे बिक गए धरती और मकान।
बीबी बच्चे रो रहे घर है नरक समान॥

सूली पर चढ़ना पड़ा करके मदिरापान।
अन्त शराबी का यही देखे हर इन्सान॥