ना उसको तू पहचान पाया
तर्ज – नाव काग़ज़ की गहरा है पानी
ना उसको तू पहचान पाया,
हर दिल में वो दाता समाया।
ढूंढ़ता है कहाँ उस प्रभु को,
सारा संसार जिसने रचाया।।
मैंने जयपुर का बाजार ढूंढ़ा,
वो ऋषिकेश हरिद्वार ढूंढ़ा
नीलकण्ठ भी मैं सावन में पहुँचा,
मैंने अपना भी घर द्वार ढूंढ़ा
ना ‘सचिन’ मैं उसे ढूंढ़ा पाया,
हर दिल में वो दाता समाया
ढूंढ़ता है कहाँ……
ना आये नज़र वो धरन में,
ना देगा दिखाई गगन में है
विधाता की शक्ति निराली,
है वो परमेश्वर कण-कण में
इस पवन को उसी ने चलाया,
हर दिल में वो दाता समाया
ढूँढता है कहाँ……
आसमाँ में सजाये हैं तारे,
हर तरफ है उसी के नज़ारे
चॉद सूरज चमकते ये बादल,
है ये रोशन उसी के सहारे
जिसने जादू ये सारा दिखाया,
हर दिल में वो दाता समाया
ढूँढता है कहाँ……










