ना चाँदी, ना सोना, ना रतन चाहिए
ना चाँदी, ना सोना, ना रतन चाहिए
ना कांटे, ना कलियाँ, ना चमन चाहिए
मुझे और कुछ भी नहीं मांगना
पिता एक तेरी शरण चाहिए।
सदा सत्य के पथ पे चलता रहूं
बचाने में औरों के जलता रहूं गिरूँ,
गिर के फिर मैं सम्भलता रहूं
लिये हाथ मरहम निकलता रहूं
किसी का ना मुझको नमन चाहिए
ना रेशम का मुझको कफन चाहिए
लइँ मैं सदा दुष्ट, अन्याय से मुझे
न्याय पथ में मरण चाहिए।
मुझे और कुछ भी नहीं मांगना
पिता एक तेरी शरण चाहिए।
किसी के अगर काम मैं आ सकूं,
जहां भेजना हो वहां जा सकूं।
तुम्हारी कृपा दृष्टि अगर पा सकूं।।
सफल जिन्दगी की गजल गा सकूं।
ना दूषित कुटिल से नयन चाहिए।
ना छल के कपट के नयन चाहिए।
पिता झूठ के तीर नित भेंदते।
मुझे सत्य का आचरण चाहिए
मुझे और कुछ भी नहीं मांगना
पिता एक तेरी शरण चाहिए।
ना मुझमें बनावट का व्यवहार हो
ना अपमान हो सिर्फ सत्कार हो
कहीं भी लहू का ना व्यापार हो
सकल विश्व संयुक्त परिवार हो
ना उड़ने को मुझको गगन चाहिए
किसी और से ना मिलन चाहिए
नहीं चाहिए चिमनियों का धुआँ
मनीषियों को सन्ध्या हवन चाहिए।
मुझे और कुछ भी नहीं मांगना
पिता एक तेरी शरण चाहिए।










