मेरे मन के गोपाल जपो ओम् ओम् ओम् ।
(तर्ज – बिना बदरा के बिजुरिया कैसे चमके)
मेरे मन के गोपाल जपो ओम् ओम् ओम् ।
कपट छल को निकाल जपो ओम् ओम् ओम्।
१. महापुरुषों के संग चढ़े भक्ति का रंग।
बुरी संगत को त्याग यही जीने का ढंग।
ज़रा करके ख़याल जपो ओम् ओम् ओम्…
२. सुनो दिल की आवाज़ खुले जीवन का राज़।
बड़ा सुन्दर संगीत मधुर श्वासों का साज़।
बजे धड़कन का ताल जपो ओम् ओम् ओम्…
३. पाँच वैरी विकार सदा करते प्रहार।
निडर हाथों में थाम रहो हरदम तैयार।
प्रभु भक्ति की ढाल जपो ओम् ओम् ओम्…
४. करो नियमित आहार और मीठा व्योहार ।
रहो नफ़रत से दूर करो जीवों से प्यार।
यही ऋषियों की चाल जपो ओम् ओम् ओम्…
५. यहाँ भोगों के भोग बिना भक्ति के रोग।
यमों नियमों को पाल करो युक्ति से योग।
कटें दुःख के जंजाल जपो ओम् ओम् ओम्…
६. तुम्हें मन्जिल की चाह भरी काँटों से राह।
करो ईश्वर को याद चलो भरके उत्साह ।
‘पथिक’ दामन सम्भाल जपो ओम् ओम् ओम्…










