मेरे मालिक तेरी नौकरी

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मेरे मालिक तेरी नौकरी

मेरे मालिक तेरी नौकरी,
सबसे बढ़िया है सबसे खरी।
तेरे दरबार की हाजरी,
सबसे ऊंची है सबसे बड़ी ।।

जब से तू मन भा गया,
मुझे जीने का आनन्द आ गया।
हो गयी जबसे रहमत तेरी,
मेरे मालिक…

जब से तेरा गुलाम हो गया,
जग में मेरा भी नाम हो गया।
वरना औकात क्या थी मेरी,
मेरे मालिक ….

चाहे घर में रहूं चाहे बाहर रहूं,
तेरी सेवा में हाजिर रहूँ।
लगे न मेरी गैर हाजरी,
मेरे मालिक….

तेरी आज्ञा को जब से लिया,
मरने जीने का दुःख मिट गया।
तूने सुखों की वर्षा करी,
मेरी मालिक…

मेरी तनख्वाह भी कुछ कम नहीं,
न मिले तो कोई गम नहीं।
वरना न भी मिले तो सही,
मेरे मालिक…

मैं नहीं था किसी काम का,
ले सहारा तेरे नाम का।
ढूंढ ली मैंने मंजिल नई,
मेरे मालिक…