मेरे आज ध्यान में आ गई बात पुरानी।।
मेरे आज ध्यान में
आ गई बात पुरानी।। टेक ।।
नहीं शान समझें थे
अपनी अधिक धनी हो जाने में,
नहीं शान समझें थे
अपनी कोठी महल बनाने में,
नहीं शान समझें थे
भौतिक ऊँचे पद के पाने में,
नहीं शान समझें थे
जनता से नारे लगवाने में,
अपनी शान समझते थे
सब सदाचारी कहलाने में,
वेद ध्वनि घर घर से
सुनाई दे थी किसी जमाने में,
न जाने कब आयेगी
अब वह घड़ी स्यात पुरानी ।।1।।
जिसे ग्राम कहते हो
यह कुटुम्ब था किसान का,
कहते हो किसान जिसे
रूप था भगवान का,
लहलहाते खेत दृश्य
पूजा का स्थान का,
कर्तव्य पालन करना
भवित धर्म था इन्सान का,
एक दूसरे के लिये
जीवन था सम्मान का,
धरती था नजारा सारा
स्वर्ग के सौपान का,
नित्य नया सन्देश सुखद दे थी
प्रभात पुरानी।।2।।
सच्चे सुख की खोज में
जो निकले थे लेकर वैराग,
झोंपड़ियों में रहते थे वह
कोठी बंगले त्याग त्याग,
इसीलिये तो कहते थे
ग्रामवासियों का सौभाग,
रहते थे समस्त मस्त गाते थे
खुशी के राग, आज लगी
ईर्षा द्वेष कलह की
ग्रामों में आग, सुख
शान्ति की होली जला दी
मना रहे फाग, मानवता
को डस गया है दानवता
का जहरी नाग, हँसों की
जगह पर बैठे उल्लू
चमगीदड़ और काग,
खुले किवाड़ो सोवें थें
अब कहां गई रात पुरानी।। 3 ।।
ग्राम तो है पर ग्रामों के
आसार पुराने नहीं रहे,
गलियारे, चौपाल चौक
घर द्वार पुराने नही रहे,
सौम्य शक्ल अलमस्त स्
वस्थ नर नार पुराने नहीं रहे,
सादा जीवन उच्च विचार
संस्कार पुराने नहीं रहे,
एक दुसरे के ऊपर
एतवार पुराने नहीं रहे,
प्रेम के सूत्र में बंधे हुये
परिवार पुराने नहीं रहे,
आहार पुराने नहीं रहे।
व्यवहार पुराने नहीं रहे,
सुख दुख के साथी लंगोटिया
यार पुराने नहीं रहे,
सच पूछो तो जीवन के
आधार पुराने नही रहे,
खेल पुराने नहीं रहे त्यौहार
पुराने नहीं रहे, फागुन की होली
और तीजों की बरसात पुरानी।।4।।
धीरे धीरे किसान का
परिवार गांव से चला गया,
घृणा नफरत का सह कर
व्यवहार गांव से चला गया,
मिट्टी के बर्तन दे था
वह कुम्हार गांव से चला गया,
जूते पहनाने वाला वह
चमार गांव से चला गया,
बढ़ई गांव से चला गया
लुहार गांव से चला गया,
धोबी गांव से चला गया
मनिहार गांव से चला गया,
जुलाहा गांव से चला गया।
सुनार गांव से चला गया,
दर्जी गांव से चला गया
बल्हार गांव से चला गया,
नाई गांव से चला गया
कहार गांव से चला गया,
शोभाराम प्रेमी वैदिक
प्रचार गांव से चला गया,
शहरों का विस्तार उजड़
रही हैं देहात पुरानी ।।5||
राह है मंजिल मगर मिलती नहीं,
चांद है पर चांदनी खिलती नहीं,
रात ढलने पर सुबह होगी जरूर,
पर करें क्या रात भी ढलती नहीं ।।










