माया मोह लोभ के कारण

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माया मोह लोभ के कारण

माया मोह लोभ के कारण
तन तो गया बेकार।
हाथ न आखिर कुछ नहीं
आया मतलब के व्यवहार ।।

छण सुख लाग बिताया जीवन,
किया नहीं भव पार ।
जन्म मरण की झंझट को मैं,
समझा नहीं करतार ।।

नहीं कुछ पुण्य किया जीवन में,
विषयी हो रत नार।
अज्ञानी मन अंधकार में
है मेरे करतार।।

जीवन नैया खड़ी भंवर में
टूटी है पतवार।
तुम बिन मेरा कौन सहारा,
आओ खेवनहार।।

आत्म समर्पण करता प्रभु,
हे जग के आधार चन्द्रशेखर
कह इसे दुनियां से कर दो
बेड़ा पार ।।