मन्यु प्रभु ! चाहते हैं हम तुझे

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मन्यु प्रभु ! चाहते हैं हम तुझे

मन्यु प्रभु ! चाहते हैं हम तुझे
तू हमारे ही अन्दर बसता रहे
हाँ बसता रहे
प्यारे मन्यु ! तुझे हम देव कहें
तू हमारे ही भीतर निवास करे
हाँ निवास करे

लोग समझते हैं क्रोध और मन्यु
दोनों प्रवृत्तियाँ हैं समरूप
लेकिन आकाश और पाताल का
अन्तर दोनों में है विरूप
तुम तो प्रभु रक्षक हो प्यारे मन्यु !
पर क्रोध असुर तो अनिष्ट करे
हाँ अनिष्ट करे
मन्यु प्रभु ! चाहते हैं हम तुझे
तू हमारे ही अन्दर बसता रहे
हाँ बसता रहे

जानते हैं तेरे उद्भव स्थान को
निर्मल मन तेरा शुद्ध आत्मा
लेकिन क्रोध में दूषित मन है
देता है सबको यातना
क्रोध, क्रोधी को बावला करे
जिससे वह आपे में कभी ना रहे
हाँ कभी ना रहे
मन्यु प्रभु ! चाहते हैं हम तुझे
तू हमारे ही अन्दर बसता रहे
हाँ बसता रहे

क्रोध तो है निर्वीर्य मन्यु की
तुम शक्ति हो प्रबल
राग-द्वेष की पतित अवस्था
करती है जीवन को विफल
कोई अगर तुम्हें रोकना चाहे
ना दबा ही सके ना नीचा कर सके
ना नीचा कर सके
मन्यु प्रभु ! चाहते हैं हम तुझे
तू हमारे ही अन्दर बसता रहे
हाँ बसता रहे

जीवन समर में हे मन्यु देव!
प्रेरक रहो, अधिष्ठाता रहो
‘सहुरि’ हो तुम अति सहनशील
रक्षण करो और पाप हरो
दे सहनशक्ति, ना क्रोध करूँ
तेरी मन्यु की शक्ति प्रकट रहे
हाँ प्रकट रहे
मन्यु प्रभु ! चाहते हैं हम तुझे
तू हमारे ही अन्दर बसता रहे
हाँ बसता रहे
प्यारे मन्यु ! तुझे हम देव कहें
तू हमारे ही भीतर निवास करे
हाँ निवास करे