मन क्यों तेरा भरमाए

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मन क्यों तेरा भरमाए

मन क्यों तेरा भरमाए
शरण प्रभु की ना आये

सूना पड़ा तेरा मन का मन्दिर
घोर अन्धेरा मन के अन्दर
उलझन सुलझ ना पाए
शरण प्रभु की ना आए
मन क्यों तेरा भरमाए

लोभ व्यसन में मन क्यों लागा
राग-द्वेष से दूर न भागा
इत उत चित्त रम जाए
शरण प्रभु की ना आए
मन क्यों तेरा भरमाए

ना जाने तू प्रीत की भाषा
फिर भी लगाए प्रभु से आशा
दर्शन किस विध पाए
शरण प्रभु की ना आए
मन क्यों तेरा भरमाए

ना कर पाया ओ३म् का सिमरन
पापी रूप देख तड़पा मन
करनी पर पछताए
शरण प्रभु की ना आए
मन क्यों तेरा भरमाए

क्या लेगा दुनियादारी से
प्रीत लगा प्रभु हितकारी से
जो सिमरे सुख पाए
शरण प्रभु की ना आए
मन क्यों तेरा भरमाए

आस जो तुझको ईश-मिलन की
पाले रङ्गत आनन्दघन की
प्रेम-रङ्ग रंगाए
शरण प्रभु की ना आए
मन क्यों तेरा भरमाए
शरण प्रभु की ना आये
मन क्यों तेरा भरमाए