नगर-नगर और डगर डगर में, गीत ऋषि के गाना।

0
67

नगर-नगर और डगर डगर में, गीत ऋषि के गाना।

नगर-नगर और डगर डगर में,
गीत ऋषि के गाना।
ले लंगोटी निकला घर से,
वेदों का दीवाना। ।।1।।

जंगल, नदियाँ, पर्वत सारे,
नगर नगर को छाना।
कहीं न मिला ठिकाना,
गीत ऋषि के गाना।।2।।

सच्चे शिव की खोज में निकला,
ऐसी लगन लगाई।
टुकड़े बरफ के खा-खा करके,
अपनी भूख मिटाई।।3।।

फिर भी ना घबराना,
गीत ऋषि के गाना।।
आखिर पहुँचा मथुरा नगरी,
वहाँ भी खोज लगाई।
दूर से देखी टूटी-फूटी,
कुटिया उसने पाई।।
वेदों का दीवाना,
गीत ऋषि के गाना।।4।।

विरजानन्द ने उससे पूछा कौन?
कहाँ से आया ?
यही जानना चाहता हूँ मैं,
यही जानने आया।।
सुनकर खूब पढ़ाना,
गीत ऋषि के गाना।।5।।

पढ़-लिखकर उस योगी ने,
वैदिक धर्म फैलाया।
दुष्टों ने फिर मिल-जुलकर के,
उसको जहर पिलाया।।

ऐसे ऋषिवर के चरणों में,
प्रेमी शीश झुकाना।।6।।
गीत ऋषि के गाना।।