लेके वेदों का प्रचार

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लेके वेदों का प्रचार

लेके वेदों का प्रचार,
‘करले
मानव का उद्धार जी।’
टंकारा से आये थे ऋषि दयानन्द ।
भागवत पुराण की पोल
सारी खोल दई।

ओ३म् ध्वज उठाई जय,
वैदिक धर्म की बोल दई।
मानी नहीं किसी से हार,
भागे पाखण्डी गँवार जी।
टंकारा से आये थे
ऋषि दयानन्द ॥ १ ॥

अछूतों को आकर गले
प्यार से लगाया था।
वेद पढ़ो आर्य बनो
पास में बिठाया था।
कीना सबके उपर प्यार,
दूर किया अत्याचार जी।
टंकारा से आये थे
ऋषि दयानन्द ॥ २ ॥

स्त्रियों को जूती यहाँ
पैरों की बताते थे।
महिलाओं को कोई वेद
विद्या न पढ़ाते था।
इनको पढ़ने का अधिकार,
कहा स्वामी ने पुकारा जी।
टंकारा से आये थे
देव दयानन्द ॥ ३ ॥

छलिया लुटेरे हमको,
लूट लूट खाते थे।
ईश्वर को भूलाया पूजा
अपनी करवाते थे।
‘राघव” किश्ती थी मंझधार,
आके किया ऋषि ने पार जी।
टंकारा से आये थे
देव दयानन्द ॥ ४ ॥