लाखों घर बरबाद हो गए
लाखों घर बरबाद हो गए,
इस दहेज की बोली में।
अर्थी चढ़ी हजारों कन्या,
बैठ न पाई डोली में॥टेक॥
कितनों ने अपनी कन्या के,
पीले हाथ कराने में।
कहाँ कहाँ तक मस्तक टेके,
आती शर्म बताने में।
जिस पर बीती वही जानता,
बात नहीं है कहने की।
जीवनभर को कर्ज लद गए,
सीमा टूटी सहने की।
गहने खेत मकान बिक गए,
सिर्फ मांग की रोली में॥१॥
टूट रहे परिवार रोज ही,
फूट रही हैं तकदीरें।
लोभी फिर भी खोज रहे हैं,
नित शोषण की तदबीरें।
नौजवान गुणवान युवक क्यों,
बनता अरे भिखारी है।
खून कलेजों का पी जाती,
यह कैसी बीमारी है।
ऐसी क्रूर प्रथा को आओ,
आज झौक दे होली में॥२॥
पति पत्नी के बीच खाईयाँ,
खोदी इस शैतान ने।
सास बहु को शत्रु बनाया,
देखो इस शैतान ने।
बेमतलब की बातों पर भी,
रार मचाई जाती है।
क्रूर कर्म कर कहीं कहीं तो,
बहु जलाई जाती है।
दानवता आघुसी कहाँ से
मानवता की खोली में॥३॥
सहन मत करो क्रूर प्रथा यह,
इसे सदा को दूर करो।
दानवता के अहंकार को,
संकल्पों को चूर करो।
बहुत हो चुका नाच अशिव का,
अब सज्जनता अपनाओ।
छोड़ रूढ़ियाँ सद्विवेक का,
निर्णय ले आगे आओ।
पापों का मत भरो खजाना,
अब तो अपनी झोली में॥४॥
























