कुछ सोच समझ प्राणी एक दिन दुनिया से है जाना…
कुछ सोच समझ प्राणी एक दिन दुनिया से है जाना…..
कुछ सोच समझ प्राणी, एक दिन…..
जिसे समझता है तू अपनी,
यह है एक सराये,
चार दिनों का मेला है
यहाँ कोई आये कोई जाये
मोह माया के जाल में फंसकर
ओ३म् को क्यों बिसराये……
तेरी यह जागीर नहीं है
यह है मुसाफिर खाना।।1।।
कुछ सोच समझ प्राणी, एक दिन…….
ठोकर खाता क्यों फिरता है
परमेश्वर को भूल,
काँटा बनकर क्यों चुभता है,
बन जा सुन्दर फूल
जिस जीवन में नहीं है सुगन्धि,
उसका क्या है मूल
लाखों योनियों में होगा
फिर निरंतर चक्कर लगाना।।2।।
कुछ सोच समझ प्राणी, एक दिन……
प्रातः सायं सन्ध्या कर ले,
ओ३म्-ओ३म् गुण गा ले,
भूखे नंगों की कर सेवा,
तू जीवन सफल बना ले
‘नंदलाल’ कहे मानव चोला,
जो है सफल बनाना।।3।।
कुछ सोच समझ प्राणी, एक दिन……










