कांटा बन कर चुभे ना किसी के लिये जिन्दगी हो

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कांटा बन कर चुभे ना किसी के लिये जिन्दगी हो

कांटा बन कर चुभे ना विसी के लिये
जिन्दगी हो तो हो जिन्दगी के लिये
आदमी ही है नफरत की एक आग सी
आदमी ही दवा आदमी के लिये

धन से जन का मिलन कर ना
पाओ तो क्या मन की सद्भावना
कुछ कम तो नही भावनाएँ जुडाती
दिलो को सदा इससे बढ़कर के
दुनियाँ में मरहम नहीं फूल को
देख कर खुद को देखो जरा जो कि
खिलता है सबकी खुशी के लिये ।।२।।

ईर्ष्या नफरत ने ईन्साँ को शैताँ किया
छा गई फिर अविद्या की काली घटा
फिर हजारों ही फिरको में ईन्साँ बटा
जल रहा जिस वजह से ये सारा जहां
राख बन कर उडी है जमी से कई
आदमी की ही अपनी खुशी के लिये ॥३।।