काशी जाकर देख लिया

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काशी जाकर देख लिया

काशी जाकर देख लिया,
मथुरा जा कर देख लिया।
कहीं पे मन की मैल न उतरी
खूब नहा कर देख लिया।

पता नहीं वह कहाँ रहता है।
यहाँ पे है कि वहाँ रहता है।
घंटा डफ घड़ियाल मजीरे
झाँझ बजा कर देख..
वस्त्राभूषण भी पहनाए।
शयन जागरण भी करवाए।


वस्त्राभूषण भी पहनाए
शयन जागरण भी करवाए
धूप दीप नैवेद्य चढ़ाया
तिलक लगा कर देख..
जिस वस्तु को हाथ लगाया।
किसी पे अपना नाम न पाया।
सब कुछ उसका दिया हुआ था
नज़र उठा कर देख.

मन में प्रश्न उठा इक ऐसे ।
जड़ वस्तु को चेतन कैसे।
पत्थर की मूरत के आगे
शीश झुका कर देख…..

यह मजबूर उमरिया तरसी।
अमृत की इक बून्द न बरसी।
चातक है प्यासे का प्यासा
शोर मचा कर देख.

इक दिन मन मन्दिर में देखा।
चमक उठी सज्ञान की रेखा।
‘पथिक’ मिला आनन्द प्रभु का
ध्यान लगा कर देख….