जीवन का बन्धन व मोक्ष
लेखक :- डॉ. प्रताप सिंह कुण्डु आयुर्वेदाचार्य
स्त्रोत :- भक्त फूलसिंह कन्या महाविद्यालय स्मारिका
आयुर्वेद के सुविख्यात ग्रन्थ चरक में एक स्थान पर प्रश्न है कि ” आत्मा सदा करनुबध्यते ? ” च.शा. २/२८ अर्थात् ( मोक्ष को छोड़ कर ) आत्मा सदा किन भावों के साथ बंधी रहती है ? इसी अध्याय में इस प्रश्न का उत्तर देते हुए शास्त्रकार कहता है:
अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैरात्मा कदाचिन्न वियुक्तरूपः ।
न कर्मणा नैव मनोमतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषः ।। च.शा. २/३६
अर्थात आत्मा का कर्म , मन , बुद्धि , अहंकार और अहंकार के विकार रूप दोषों के साथ सदा बन्धन रहता है, आत्मा इन भावों के साथ सदा क्यों बंधी रहती है , इसका स्पष्टीकरण भी इस अध्याय में दिया है –
रजस्तमोभ्यां हि मनोऽनुबद्धं ज्ञानं विना तत्र हि सर्वदोषाः ।
गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्तं मनः सदोषं बलवच्च कर्म ।। च.शा .२ / ३०
अर्थात् जब तक मन रज और तम से बंधा है या रज और तम का उद्रेक रहता है तो मनुष्य को ज्ञान नहीं होता और ज्ञान न होना ही सब दोषों का कारण है । जीव शुभ – अशुभ दोनों प्रकार के कर्म करता चला जाता है और इन कर्मों के भोग भोगने के लिये जन्म – मरण के बन्धन में बंधता चला जाता है जब तक कि मोक्ष न हो जाये । उपनिषद् के शब्दों में अकामचार सदा बन्धनों में बंधते है तथा कामचार बन्धनों से मुक्त रहते हैं । साराँश में शुभाशुभ जन्मजन्मान्तर के कर्मों के परिणामस्वरूप जीव वरूण के पाशों द्वारा बन्धन में बंधा रहता है , यथा कहा भी है
ये ते शतं वरूण ये सहस्त्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः “
कात्यायन श्रो . २५/१/१०
जीवन के 5 क्लेश ( Five impediments of life – अविद्या ( Illusion ) , अस्मिता ( Self conciousness ) ; राग ( Attachment ) , द्वेष ( Aversion ) , अभिनिवेश ( Death or yearning for life ) तथा ऋषि पतञ्जलि द्वारा योगदर्शन में वर्णित 9 अन्तरायों ( विघ्नों – Obstacles or distractors of mind ) के द्वारा भी जीव जन्म – मरण के बन्धन में बंधा रहता है । अब प्रश्न उठता है कि क्या इस बन्धन से छूटने या मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं ? उपाय है , आइये विचार करें । महर्षि पतञ्जलि के महाभाष्य में वेदों के सम्बन्ध में उद्धृत यह कथन आँखें खोलने के लिये पर्याप्त है कि
” एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके कामधुग् भवति “
विकास की दो दिशाएँ मानी जाती है भौतिक विकास , आध्यात्मिक विकास शिश्नोदर – परायण भौतिक विकास से यदि यह समस्या सुलझती तो फिर संसार में दुःख व अशान्ति का साम्राज्य क्यों व्याप्त है ? उत्तर सहज , सीधा व सटीक है कि आध्यात्मिकतावादी संस्कृति ( जिसका स्रोत वेद है ) को अपनाये बिना मनुष्य , समाज या सम्पूर्ण मानवता का पिण्ड दुःखों या अशान्ति से छूटने वाला नहीं है और न ही जीवन – मरण का बन्धन टूटने वाला क्योंकि मात्र वैदिक संस्कृति ही सार्वभौम संस्कृति है तथा वेदों का ज्ञान त्रैकालिक सत्य है क्योंकि वेद ईश्वर की शक्ति से प्रसूत है । वेदमार्तण्ड आचार्य प्रियव्रत के शब्दों में ” वेद ही वास्तव में वह गंगोत्री है जहाँ से वैदिक या भारतीय संस्कृति की गंगा प्रवाहित होती है । वरूण के पाशों द्वारा जन्म – मरण के बन्धन में बंधा जीव यजुर्वेद के शब्दों में देवरहित आयु के द्वारा छूट सकता है । वहाँ कहा है –
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम् भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ।।
यजुर्वेद २५/११
जीवन के 5 क्लेशों वा जीवन – मृत्यु के बन्धन से छूटने का उपाय उपनिषद्कार ने इस प्रकार बतलाया है
एतदालम्बनं श्रेष्ठं एतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ।।
कठोपनिषद् १/२/१७
अथर्ववेद के शब्दों में जन्म – मरण के बन्धन या मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाने वाला हमारा प्यारा पिता परमेश्वर है । यथा •
अकामो धीरो अमृतः स्वयम्भू र सेन तृप्तो न कुतश्चनोनः ।
तमेव विद्वान् न विभाय मृत्योरानं धीरमजर युवानम् ।।
अथर्ववेद १०/८/४४
योगदर्शन में वर्णित नौ अन्तरायों
व्याधि स्त्यान संशयः प्रमादालस्याविरतिभ्रान्ति
दर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ।
योग दर्शन १/३०
के कारण जीवन – मृत्यु के बन्धन से बचने वा ब्रह्मलक्ष्य को भेदने की धनुर्विद्या मुण्डक में निम्न शब्दों में दी है :
धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासा निशितं सन्धीयत ।
आयम्य तद् भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सौम्य विद्धि ।।
मुण्डकोपनिषद् २ / २/
भला हो महान् द्रष्टा प्राज्ञचक्षु स्वामी विरजानन्द के अद्वितीय शिष्य तथा वर्तमान कलियुग के एकमात्र ऋषि देव दयान का जिन्होंने वेद – ज्ञान की पुनर्स्थापना की तथा अपने अमर ग्रन्थ ” सत्यार्थ प्रकाश ” के माध्यम से हमें यह बताया कि संस में सर्वोत्तम जीवन यापन करने का जन्म – मरण के बन्धन से छूटने का एकमेव उपाय अपरा विद्या व परा विद्या का सामञ्जस्य है अर्थात् कर्मकाण्ड व ज्ञानकाण्ड के सामञ्जस्य से ही दुस्तुर सांसारिक भवसागर का पार पाया जा सकता है ।










