जिसके कर्म उजले होते, मन में उसे बसावे क्या।
जिसके कर्म उजले होते,
मन में उसे बसावे क्या।
जिसके साथी अनगिन होते,
शत्रु उसे सतावे क्या।
हाथ सजे रत्नों से जब,
चोर लूट ले जावे क्या।
“धर्मी” जन सम्मान करें जब,
दोषी दोष लगावे क्या। (1)
बुढ़ापा जब आता है,
तन की शक्ति घट जाती है।
गति रुके, दांत गिर जाएं,
आंखें राह न दिखाती हैं।
मुख से लार टपकती रहती,
संगी-साथी छूटे सब।
बेटा बैरी बन जाता,
संग न त्रिया निभाती है।(2)
तन में व्याधि अनगिन, फिर भी,
औरों का उपचार करे।
सबसे कहे धन अर्जन करूं,
भोजन औरों पर निर्भर करे।
सबसे कहे योगी हूं मैं,
दुराचार से प्रेम करे।
“धर्मवीर” ऐसे नर को,
कोई मान-सम्मान न दे।(3)
दरिद्रता निकट न आए,
जो नित्य व्यापार करे।
मन में पाप न पाल सके,
जो ईश का आधार करे।
जिसने मौन-व्रत साध लिया,
वह शोक न मनाए रे।
“धर्मवीर” निर्भय वह रहता,
जो जन-जन से प्रेम करे।(4)










