जिस जगह जाता हूँ मैं

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जिस जगह जाता हूँ मैं

जिस जगह जाता हूँ मैं,
तुझे को वहाँ पाता नहीं
किस तरह पूजा करूँ,
कुछ समझ आता नहीं

जिस जगह जाता हूँ मैं,
तुझे को वहाँ पाता नहीं
किस तरह पूजा करूँ,
कुछ भी समझ आता नहीं

हो तुम्हीं माता-पिता
सब के अनादि काल से
तू अजन्मा है तेरा,
कोई पिता माता नहीं
जिस जगह जाता हूँ मैं,
तुझे को वहाँ पाता नहीं

ढूँढ ही लेता तुझे
आकाश या पाताल में
क्या करूँ हुलिया तेरा
कोई तो बतलाता नहीं
जिस जगह जाता हूँ मैं,
तुझे को वहाँ पाता नहीं

रूप रस गन्ध शब्द से
व स्पर्श तू रहित है
इन्द्रियों से इसलिए
जाना कभी जाता नहीं
जिस जगह जाता हूँ मैं,
तुझे को वहाँ पाता नहीं
किस तरह पूजा करूँ,
कुछ भी समझ आता नहीं
जिस जगह जाता हूँ मैं,
तुझे को वहाँ पाता नहीं